कौन थे पूर्वोत्तर के शिवाजी और असमिया पहचान के प्रतीक लाचित बॅड़फूकन ?

Story by  मंजीत ठाकुर | Published by  [email protected] • 2 Months ago
लाचित बड़फूकन

मंजीत ठाकुर

नई दिल्ली के विज्ञान भवन में लाचित बड़फूकन (Lachit Borphukan) की 400वीं जयंती के जश्न का 25 नवंबर को समापन हुआ. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समापन कार्यक्रम में अतिथि के तौर पर उपस्थित थे. उनके साथ ही गृहमंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और कानून मंत्री किरेन रिजिजू भी मौजूद थे.

पिछले हफ्ते लाचित बड़फूकन (Lachit Borphukan) पर एक थीम सॉन्ग को असम के मुख्यमंत्री हेमंत विस्वा सरमा ने रिलीज किया था और सको जुबिन गर्ग ने गाया था. सरमा ने तब कहा था कि यह गाना महावीर लाचित बड़फूकन (Lachit Borphukan) के बलिदान (The heroism of Lachit Borphukan) को श्रद्धांजलि है. मुख्यमंत्री सरमा ने उम्मीद जताई थी कि इस गीत से आम लोगों में राष्ट्रीयता की भावना का संचार होगा.

बेशक स्कूली इतिहास में लाचित बड़फूकन (Lachit Borphukan) के बारे में अधिक उल्लेख नहीं है और अगर है भी तो दिल्ली-आगरे के सम्राटों-बादशाहों की तुलना में कम है. ऐसे में यह जानना दिलचस्प होगा कि आखिर लाचित बड़फूकन (Lachit Borphukan) की क्या महागाथा है. (legendary Ahom general)

असल में, आज जिसे असम कहा जाता है उसके बहुत बड़े हिस्से पर अहोम वंश का शासन रहा था. यह शासन छह सौ सालों तक चला और तभी खत्म हुआ जब उन्नीसवीं सदी में बर्मा के राजा मिंगीवाहा तिलवा ने अहोम साम्राज्य के आखिरी राजा चंद्रकांत सिंहा पर हमला करके उनको कैद कर लिया. भारतीय इतिहासकारों ने लिखा है कि तिलवा ने चंद्रकांत सिंहा को मार डाला, जबकि बर्मीज इतिहासकार कहते हैं कि चंद्रकांत सिंहा उन दिनों ब्रिटिश शासन में रहे बंगाल की तरफ भाग गए.

बहरहाल, 13वीं सदी से लेकर 19वीं सदी के मध्य तक करीब 600 सालों तक अहोम वंश का शासन असम पर रहा. अहोम वंश के शासन के असम के इतिहास में स्वर्णिम काल माना जाता है. और यह राज्य ब्रह्मपुत्र घाटी के ऊपरी और निचले दोनों कछारों में विस्तृत था.

साल 1615 से लेकर 1682 के बीच मुगलों के साथ अहोम राजाओं का निरंतर संघर्ष चलता रहा. यानी जहांगीर से समय से जो युद्ध शुरू हुए, वह औरंगजेब के काल तक चलते रहे. इनमें से सबसे बड़ा युद्ध जनवरी 1662 में हुआ था, जिसमें एक तरह से मुगलों की जीत हुई थी. उस युद्ध में मुगलों ने असम के कुछ हिस्से जीत लिए थे और अहोम राजधानी गढ़गांव (गुवाहाटी) पर कब्जा कर लिया था.

मुगलों के हाथों खोए अपने इलाके हासिल करने के लिए अहोम राजा स्वर्गदेव चक्रध्वज सिंहा ने अब युद्ध शुरू कर दिया. शुरुआत में अहोमों ने कुछ इलाके जीत लिए. उसके बाद औरंगज़ेब ने 1669 में जयपुर के राजा राम सिंह प्रथमको इन खोए हुए क्षेत्र को फिर से हासिल करने के लिए भेजा. नतीजतन, 1671 में सरायघाट का युद्ध हुआ.

अहोम साम्राज्य के एक सेनापति थे लाचित बड़फूकन (Lachit Borphukan), जिन्हें ब्रह्मपुत्र घाटी के इलाकों के चप्पे-चप्पे की जानकारी थी. यही नहीं वह आसपास के पहाड़ी इलाकों से भी पूरी तरह परिचित थे. अहोम राजा चक्रध्वज सिंहा ने उन्हें पांच बड़फुकन में चुना था और उन्हें प्रशासनिक, न्यायिक और सैन्य जिम्मेदारियां सौंप दीं.

मुगलों की युद्ध प्रणाली थी खुले में युद्ध करना और उनके पास बहुत विशाल सेना हुआ करती थी. इसकी बजाए लाचित बड़फूकन (Lachit Borphukan) ने गुरिल्ला युद्ध को अपनाया (legendary Ahom general) और इसकी वजह से उनकी छोटी लेकिन तेजतर्रार सेना को बढ़त मिलती गई.

यह कुछ ऐसी ही युद्ध रणनीति थी, जैसी शिवाजी ने मुगलों के खिलाफ मराठवाड़ा में अपनाई थी. लाचित बड़फूकन (Lachit Borphukan) ने मुगल सैन्य शिविरों को काफी नुक्सान पहुंचाया. वह अचानक अपनी टुकड़ी के साथ मुगल फौज पर हमला कर देते और जब तक मुगल फौज प्रतिक्रिया दे पाती, वह जबरदस्त नुक्सान करके वापस पहाड़ियों में जा छिपते. मुगल फौज का आकार इतना भारी भरकम था कि तेजी से प्रतिक्रिया दे पाना, उनके लिए मुश्किल था.

जब असम में बरसात का मौसम आ गया तो मुगलो के लिए मुश्किलें बढ़ती चली गई. लेकिन मुगल अपने नुक्सान के बावजूद अपनी बड़ी संख्या के दम पर अलाबोई की तराई में पहुंच कर शिविर स्थापित करने में कामयाब रहे. तब अहोम राजा ने बड़फूकन को आदेश दिया कि अब निर्णायक युद्ध का वक्त आ गया है. ऐसे में, जब लाचित बड़फूकन (Lachit Borphukan) ने मुगलों पर निर्णायक हमला किया तो वह अहोम सेना के लिए अधिक नुक्सानदेह साबित हुआ और उस युद्ध में दस हजार अहोम सैनिक मारे गए. इस प्रकार मुगलों को 1669 में जीत तो मिली पर काफी संख्या में मुगल सैनिकों के हताहत होने से वे इस जीत का जश्न मना पाने की स्थिति में नहीं थे.

अब मुगल ब्रह्मपुत्र घाटी में और आगे बढ़ना चाहते थे, और तब उन्हें लगा कि ब्रह्मपुत्र नदी के रास्ते यात्रा करना अधिक सुगम होगा. लेकिन लाचित बड़फूकन (Lachit Borphukan) काफी अच्छे युद्ध रणनीतिकार तो थे ही, अच्छे नौसैनिक योद्धा भी थे. उन्होंने कामचलाऊ किस्म के जंगी जहाज (नौकाएं) तैयार करवाईं और मुगल सेना पर हमले करने लगे.

लाचित बड़फूकन (Lachit Borphukan) ने आगे और पीछे दोनों तरफ से हमले का जाल बुन दिया. सामने की तरफ कुछ जहाज रखकर उन्होंने मुगलों को आगे बढ़ने के लिए ललचाया और फिर पीछे की तरफ से जोरदार हमला बोल दिया. मुगल अपने पीछे नदी को असुरक्षित छोड़कर आगे बढ़ रहे थे क्योंकि अपनी जीत के बाद उन्हें इस बात का गुमान भी नहीं था कि अहोम सेना पीछे की तरफ से भी हमला कर सकती है. पीछे से हुए हमले का सामना मुगल सेना नहीं कर पाई और अहोम सेना ने मुगलों को जबरदस्त तरीके से हरा दिया.

हालांकि, इस युद्ध के बाद बीमारी की वजह से लाचित बड़फूकन (Lachit Borphukan) का निदन हो गया. कई इतिहासकारों ने लिखा है कि वह सराईघाट के युद्ध के समय ही काफी बीमार थे, लेकिन वह अपने सिपाहियों को जीत दिलवाने पर अड़े रहे.

बेशक, हम संस्कृति के अपने नायक होते हैं जिससे वह संस्कृति और वह समाज अपनी अस्मिता को जोड़ता है. समय के साथ लाचित बड़फूकन (Lachit Borphukan) हर बाहरी ताकत के खिलाफ असमिया प्रतिरोध का प्रतीक बन गए. वह असम के सबसे महान नायको में गिने जाने लगे. वह वीरता, दिलेरी और बुद्धिमत्ता के असमिया प्रतीक (The heroism of Lachit Borphukan) बन गए.