काठमांडू
नेपाल में राजशाही समर्थकों ने रविवार को राजधानी काठमांडू में बड़ी रैली आयोजित की और मार्च में होने वाले संसदीय चुनावों से पहले राजा ज्ञानेंद्र को पुनः बहाल करने की मांग की। यह रैली पिछले साल सितंबर में असंतुष्ट युवाओं द्वारा किए गए हिंसक प्रदर्शनों और ‘जेन-जेड’ आंदोलन के बाद हुई पहली बड़ी सार्वजनिक सभा थी।
रैली में शामिल समर्थक शाह वंश के संस्थापक राजा पृथ्वी नारायण शाह की प्रतिमा के चारों ओर इकट्ठा हुए और ‘‘हम अपने राजा से प्यार करते हैं। राजा को वापस लाओ’’ जैसे नारे लगाए। वर्तमान सरकार ने मार्च में नए संसदीय चुनावों का कार्यक्रम तय किया है, और इस माहौल में राजा की बहाली की मांग ने राजनीतिक बहस को और बढ़ा दिया है।
इस अवसर पर राजशाही समर्थक सम्राट थापा ने कहा, ‘‘देश की वर्तमान परिस्थितियों और ‘जेन-जेड’ आंदोलन के बाद स्थिति को संभालने के लिए राजशाही को बहाल करना आवश्यक है। हमारे लिए अंतिम और एकमात्र विकल्प राजा और राजशाही ही हैं।’’ उन्होंने यह भी जोर दिया कि देश में स्थिरता और मार्गदर्शन के लिए राजशाही का पुनरुत्थान जरूरी है।
जेन-जेड पीढ़ी, जिनका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ, इस आंदोलन का प्रमुख हिस्सा रही है और इन्हीं युवाओं की सक्रिय भागीदारी के कारण पिछले साल नेपाल में कई हिंसक घटनाएं हुईं। हालांकि, रविवार की रैली शांतिपूर्ण रही क्योंकि दंगा पुलिस ने कार्यक्रम पर कड़ी निगरानी रखी थी।
राजशाही समर्थकों की यह रैली विशेष रूप से पृथ्वी नारायण शाह की जयंती पर आयोजित की गई थी। पिछले वर्षों में इस वार्षिक रैली में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच कई बार झड़पें हुई हैं। उदाहरण के लिए, पिछले साल मार्च में राजा के समर्थन में आयोजित रैली के दौरान हुई हिंसा में दो लोगों की मौत हो गई थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल में राजशाही समर्थक और गणराज्य समर्थक वर्गों के बीच राजनीतिक खाई लगातार बढ़ रही है। मार्च में होने वाले संसदीय चुनाव इस बहस का निर्णायक मोड़ साबित हो सकते हैं। राजशाही समर्थक रैलियों के जरिए अपने विचारों को मजबूत कर रहे हैं, जबकि देश की अंतरिम सरकार और लोकतांत्रिक संस्थाएं शांतिपूर्ण चुनाव कराने के लिए तैयारियां कर रही हैं।
इस प्रकार नेपाल में राजनीतिक तनाव और राजशाही बहाली की मांग अब आगामी चुनावों की पृष्ठभूमि में और अधिक केंद्रित हो गई है, जिससे देश के लोकतांत्रिक मार्ग पर नए सवाल खड़े हो गए हैं।