हाजियों की सेवा को जिंदगी बना चुके हैं हाजी शाहिद

Story by  फरहान इसराइली | Published by  [email protected] | Date 04-10-2026
Haji Shahid has dedicated his life to serving the pilgrims.
Haji Shahid has dedicated his life to serving the pilgrims.

 

फरहान इजरायली/ जयपुर

खुदाई खिदमतगार बादशाह खान की मिसाल तो इतिहास के पन्नों में दर्ज है। आज जयपुर की गलियों में एक ऐसी ही शख्सियत मौजूद है। उनका नाम है हाजी शाहिद मोहम्मद। 60 साल की उम्र में भी उनका जज्बा 25 साल के किसी उत्साही युवा जैसा है। पिछले दो दशकों से उन्होंने अपनी जिंदगी राजस्थान से मक्का-मदीना जाने वाले हज यात्रियों की खिदमत में समर्पित कर रखी है।

जयपुर के मशहूर रामगंज बाजार स्थित रिसालदार हाउस में रहने वाले शाहिद मोहम्मद पूर्व में राजस्थान हज कमेटी के सदस्य रह चुके हैं। सेंट्रल हज कमेटी की तरफ से उन्होंने ट्रेनर, मास्टर ट्रेनर और स्टेट कोऑर्डिनेटर का पद भी संभाला है। जब उनसे उनका परिचय पूछा जाता है तो वे इन सरकारी पदों का जिक्र नहीं करते। चेहरे पर सादगीभरी मुस्कान लाकर वे बस इतना कहते हैं कि वे खुद को एक हज खिदमतगार मानते हैं। अल्लाह के मेहमानों की सेवा का मौका मिलना उनके लिए सबसे बड़ा सौभाग्य है।

रात के दो बजे अगर जयपुर एयरपोर्ट पर हज यात्रियों की कोई फ्लाइट उतरती है, तो सरकारी अमला दफ्तर के समय पर ही मिलेगा। लेकिन हाजी शाहिद मोहम्मद बिना वक्त देखे वहां सबसे पहले पहुंचते हैं। उनका मानना है कि खिदमत का काम सिर्फ दफ्तरी ड्यूटी नहीं है। यह दिल का जुड़ाव और अंदरूनी जज्बा है।

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एक सफर जिसने बदल दी पूरी जिंदगी

हाजी शाहिद मोहम्मद की यह यात्रा साल 2000 में शुरू हुई थी। वे पहली बार खुद हज करने मक्का गए थे। वहां उन्होंने देखा कि बहुत से बुजुर्ग हाजी परेशान थे। कई लोग पढ़े-लिखे नहीं थे। उन्हें भाषा की समस्या आ रही थी। वहां रहने और खाने-पीने की चीजें समझने में दिक्कत हो रही थी।

जयपुर वापस लौटते ही उनके दिल में एक इच्छा जागी। उन्होंने अल्लाह से दुआ मांगी कि उन्हें ऐसा जरिया बनाया जाए जिससे वे हज यात्रियों की मदद कर सकें। इसके बाद वे सेवाभावी संस्थाओं से जुड़े।

साल 2002 में राजस्थान सरकार ने उन्हें दिल्ली भेजा। वहां सेंट्रल हज कमेटी ने उन्हें ट्रेनिंग दी और वे एक अधिकृत ट्रेनर बन गए। साल 2005 में सेंट्रल हज कमेटी मुंबई की ओर से उन्हें पूरे राजस्थान का हज कोऑर्डिनेटर बनाया गया। उन्होंने दो साल तक यह जिम्मेदारी बखूबी निभाई। इसके बाद चेयरमैन बदलते रहे, लेकिन शाहिद मोहम्मद का खिदमत का काम कभी नहीं रुका।

शाहिद मोहम्मद के पारिवारिक पृष्ठभूमि की बात करें तो उनके पिता 1970 में पार्षद चुने गए थे और चेयरमैन भी रहे। परिवार के भरण-पोषण के लिए उनके घर के नीचे स्टेशनरी की एक छोटी सी दुकान है। परिवार में तीन भाई और दो बहनें हैं। उनके अपने तीन बच्चे हैं। बेटा बीकॉम की पढ़ाई पूरी कर चुका है और बेटी सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रही है।

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वाट्सएप नेटवर्क से लेकर फाउंडेशन तक मजबूत ढांचा

हाजी शाहिद मोहम्मद साल 2005 से 'राजस्थान हज ट्रेनर रिलीफ़ फ़ाउंडेशन' के अध्यक्ष हैं। यह संस्था पूरी तरह बिना किसी मुनाफे के सेवा भाव पर चलती है। इसमें करीब 30 से 35 सदस्य शामिल हैं। ये सभी लोग पेशेवर कारोबारी हैं। इन साथियों के पास पैसों से ज्यादा सेवा का जज्बा है और इसी सोच के साथ वे इस मुहिम से जुड़े हैं।

तकनीक के दौर में काम को आसान बनाने के लिए साल 2022 में उन्होंने 'ऑल इंडिया हज इंफ़ॉर्मेशन ग्रुप' बनाया। आज इस वाट्सएप ग्रुप से करीब 1000 लोग सीधे जुड़े हुए हैं। हज यात्रियों की कोई भी जमीनी परेशानी इस ग्रुप के माध्यम से सीधे अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों तक तुरंत पहुंच जाती है।

इस डिजिटल नेटवर्क की शुरुआत में कोटा के मिर्जा आरिफ बेग सबसे पहले जुड़े थे। आरिफ बेग कोटा में नर्सिंग हेड हैं और सेंट्रल हज कमेटी के मेडिकल मिशन में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। उन्होंने इस ग्रुप को खड़ा करने में बड़ा सहयोग दिया।

इसके अलावा दिल्ली से पूर्व आईएएस मोहम्मद इकबाल, राजस्थान स्टेट हज कमेटी के अधिशासी अधिकारी अबू सुफियान, मोहम्मद उसामा, आसिफ खान हम्ज़ा और मोहम्मद अससास जैसे लोग भी इस ग्रुप का हिस्सा हैं। यह पूरा तंत्र आज भी हाजियों की हर संभव मदद में सक्रिय रहता है।

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मक्का की बस और खोए हुए सामान का किस्सा

हाजी शाहिद मोहम्मद एक दिलचस्प वाकया याद करते हैं। एक बार मक्का में करीब 20 से 25 हाजियों का सामान एक बस की डिग्गी में ही रह गया। ड्राइवर सामान लेकर बस आगे बढ़ा ले गया। घबराए परिजनों ने जयपुर में शाहिद मोहम्मद से संपर्क किया।

शाहिद ने तुरंत उस बस का नंबर और फोटो अपने ऑल इंडिया वाट्सएप ग्रुप में शेयर कर दिया। ग्रुप में मौजूद अधिकारी अबू सुफियान ने मामला संभाला और स्थानीय सऊदी प्रशासन से संपर्क साधा। पता चला कि बस शहर से 50 किलोमीटर दूर खड़ी है।

हज अमला तुरंत वहां पहुंचा। ड्राइवर को बुलाया गया और पूरी वीडियोग्राफी के साथ सामान निकलवाकर हाजियों तक पहुंचाया गया। यह पूरी कार्रवाई ग्रुप में लाइव अपडेट हो रही थी। कुछ ही घंटों में सभी हाजियों को उनका कीमती सामान सुरक्षित वापस मिल गया।

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युवाओं के लिए सलाह और नियमों में बदलाव

शाहिद मोहम्मद बताते हैं कि साल 2011-12 के समय राजस्थान से 15 हजार तक हज आवेदन आते थे। लेकिन धीरे-धीरे यात्रा महंगी होती गई। हज कमेटी ऑफ इंडिया ने नए नियम लागू किए। पहले पांच साल बाद दोबारा हज पर जाने की छूट थी। लेकिन पिछले 10 सालों से यह नियम बंद है।

परिणामस्वरूप अब जितने आवेदन आते हैं, लगभग सभी का चयन हो जाता है। लॉटरी निकालने की नौबत कम ही आती है। फिलहाल राजस्थान से हर साल करीब 5000 लोग ही हज पर जा पाते हैं। अगर नियमों में थोड़ी ढील दी जाए तो यह संख्या फिर से बढ़ सकती है। बहुत से लोग अपने दिवंगत माता-पिता या दादा-दादी की तरफ से 'हज-ए-बदल' करना चाहते हैं।

पुराने समय में लोग अपनी तमाम सांसारिक जिम्मेदारियों से मुक्त होकर बुढ़ापे में हज पर जाते थे। शाहिद मोहम्मद लोगों को समझाते हैं कि जैसे खाने-पीने और इबादत का असल आनंद जवानी में है, वैसे ही हज की इबादत का असली मजा भी जवानी में ही है।

जयपुर से सीधी फ्लाइट शुरू होने के बाद से युवाओं में हज को लेकर रुझान काफी बढ़ा है। वे नए हाजियों को यही सलाह देते हैं कि सेहत रहते ही हज के अरकान पूरे कर लेने चाहिए। हज के दौरान एक हाजी को हर दिन औसतन 15 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है। एक तंदुरुस्त और जवान इंसान इन कठिन नियमों को आसानी से पूरा कर सकता है। बुजुर्ग या बीमार अवस्था में भी हज पूरा होता है, लेकिन उसमें शारीरिक परेशानियां ज्यादा झेलनी पड़ती हैं।

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बिना किसी फीस के 5 दिन का मुफ्त ट्रेनिंग कैंप

एयरपोर्ट पर काम करते हुए शाहिद मोहम्मद ने ध्यान दिया कि बहुत से हाजियों को हज के धार्मिक नियमों और अरकान की पूरी जानकारी नहीं होती थी। वे छोटी-छोटी चीजों के लिए भटकते थे।

इस समस्या को दूर करने के लिए उन्होंने साल 2006 में एक हफ्ते का ट्रेनिंग कैंप शुरू किया। अब यह 5 दिन का विशेष ट्रेनिंग कैंप बन चुका है। पिछले 20 सालों से यह कैंप बिना किसी रुकावट के लगातार आयोजित किया जा रहा है। इसमें जयपुर के अलावा आसपास के जिलों से भी हज यात्री आते हैं।

कैंप के शुरुआती तीन दिनों में पूरे हज सफर की बारीक जानकारी चरणबद्ध तरीके से दी जाती है। बाकी के दो दिनों में रोजाना एक घंटा लब्बैक, तीसरा-चौथा कलमा और जरूरी दुआएं याद कराई जाती हैं। इसके बाद जब हाजी सऊदी अरब पहुंचते हैं, तो उन्हें किसी से पूछने की जरूरत नहीं पड़ती।

हर साल औसतन 500 से 700 लोग इस कैंप में भाग लेते हैं। इस पूरे प्रशिक्षण के लिए कोई फीस नहीं ली जाती। हाजियों के नाश्ते और पानी का पूरा इंतजाम शाहिद मोहम्मद और उनकी 30-35 वालंटियर्स की टीम अपनी तरफ से करती है।

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मास्टर ट्रेनर बनने से लेकर जयपुर से सीधी उड़ान का सफर

शाहिद मोहम्मद अब तक पांच बार आधिकारिक हज ट्रेनर रह चुके हैं। स्टेट हज कमेटी हर 300 यात्रियों पर एक ट्रेनर भेजती है। दो बार राजस्थान हज कमेटी ने उन्हें सेंट्रल हज कमेटी के मास्टर ट्रेनर प्रोग्राम के लिए चुना।

साल 2012 में जब सेंट्रल हज कमेटी ने मास्टर ट्रेनर कार्यक्रम शुरू किया, तो हर राज्य से केवल दो प्रतिनिधि बुलाए गए थे। राजस्थान से चुने जाने वाले पहले शख्स शाहिद मोहम्मद ही थे। वे 2013 से 2015 और फिर 2022 से 2025 तक राजस्थान हज कमेटी के सदस्य रहे।

फिलहाल कमेटी का कार्यकाल खत्म हो चुका है और नई कमेटी का गठन होना बाकी है। लेकिन शाहिद मोहम्मद का साफ मानना है कि कमेटी रहे या न रहे, खिदमत का काम रुकना नहीं चाहिए। वे आज भी अधिकारियों के संपर्क में रहकर हाजियों की हर संभव सहायता कर रहे हैं।

जयपुर से सीधी उड़ान शुरू कराने में भी उनकी अहम भूमिका रही है। 2004 से पहले राजस्थान के सभी हाजियों को दिल्ली जाकर फ्लाइट पकड़नी पड़ती थी। दूरी ज्यादा होने से खर्च और परेशानी दोनों बढ़ती थी।

साल 2004 में जब सलीम कागजी हज कमेटी के चेयरमैन थे और शाहिद मोहम्मद स्टेट कोऑर्डिनेटर थे, तब दोनों ने मिलकर केंद्र सरकार से जयपुर एयरपोर्ट से सीधी फ्लाइट की मांग की। सरकार मान तो गई, लेकिन पहले साल एयरपोर्ट पर पूरी तैयारी नहीं थी।

तब एक बीच का रास्ता निकाला गया। जयपुर के जाम-ए-हिदायत में इमिग्रेशन की सारी औपचारिकताएं पूरी की गईं। वहां से हाजियों को बसों में बैठाकर एयरपोर्ट भेजा गया। इस सफल प्रयोग के बाद 2005 से जयपुर एयरपोर्ट से सीधी हज उड़ानें शुरू कर दी गईं।

148 सीटों का चर्चित किस्सा और हज हाउस की सुविधा

शाहिद मोहम्मद 2009 का एक चर्चित किस्सा याद करते हैं। उस साल सेंट्रल हज कमेटी से राजस्थान को 148 अतिरिक्त हज सीटें मिलीं। तत्कालीन प्रशासक शफी अहमद कुरैशी ने उन्हें दफ्तर बुलाकर इन सीटों के सही बंटवारे पर राय मांगी।

शाहिद मोहम्मद ने सुझाव दिया कि एक विशेष कैंप लगाया जाए। इसमें 85 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों और लगातार चार साल से आवेदन कर रहे लोगों को प्राथमिकता दी जाए। सुझाव मान लिया गया। प्रेस रिलीज जारी हुई और जयपुर के मुस्लिम मुसाफिरखाने में शिविर लगा।

लेकिन पहले दिन सिर्फ 80 सीटें ही भर पाईं। शाहिद मोहम्मद ने तुरंत दोबारा प्रशासक से बात की और उम्र सीमा घटाकर 80 साल तथा आवेदन की सीमा तीन साल करने का सुझाव दिया। अगले दिन नया कैंप लगा और सभी 148 सीटें भर गईं। इस पारदर्शी तरीके की तारीफ सेंट्रल हज कमेटी ने भी की और बाद में इस मॉडल को पूरे देश में लागू किया गया।

जयपुर के कर्बला इलाके में स्थित हज हाउस भी हाजियों के लिए बड़ी राहत साबित हुआ है। 7 मई 2013 को तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसका उद्घाटन किया था। हज हाउस बनने से पहले लोगों को फॉर्म जमा करने के लिए जयपुर सचिवालय के चक्कर काटने पड़ते थे। दोपहर 2 बजे के बाद पास बनता था। वहां वजू, नमाज या बैठने की कोई व्यवस्था नहीं थी।

अब हज हाउस में फॉर्म जमा करने से लेकर मेडिकल जांच और ट्रेनिंग कैंप तक की सारी सुविधाएं एक ही छत के नीचे मिल जाती हैं। सरकारी व्यवस्थाओं पर वे बेबाकी से कहते हैं कि कमियां हर जगह होती हैं, जिन्हें सुधारा जा सकता है। लेकिन हाजियों की सेवा केवल दफ्तरी समय की नौकरी नहीं है, यह दिल के जज्बे से जुड़ा काम है।

भविष्य की योजनाओं पर बात करते हुए वे बस इतनी दुआ मांगते हैं कि अल्लाह उन्हें और उनके साथियों को सेहत और हिम्मत दे, ताकि वे इस खिदमत को यूं ही जारी रख सकें। किसी अवॉर्ड या सम्मान के सवाल पर वे सादगी से कहते हैं कि हाजियों की दुआएं और उनका मुस्कुराता चेहरा ही उनका सबसे बड़ा इनाम है। जब तक सांसें हैं, वे अल्लाह के मेहमानों की सेवा में ऐसे ही डटे रहेंगे।