सुहेल खान: 23 नेशनल गोल्ड के बाद इनकम टैक्स विभाग में नौकरी, अब वर्ल्ड चैंपियन बनने का लक्ष्य
Story by ओनिका माहेश्वरी | Published by onikamaheshwari | Date 10-10-2026
Kudo’s ‘Golden Boy’ Suhel Khan: From 23 National Gold Medals to Aiming for the World Championship
ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
मध्य प्रदेश केसागर से शुरू हुई मार्शल आर्ट की यात्रा ने सुहेल खान को कूडो के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। पांचवीं कक्षा में स्कूल से निलंबन के बाद मिली एक नई दिशा से शुरू हुआ सफर आज 23 लगातार नेशनल गोल्ड मेडल और 105-0 के नेशनल फाइट रिकॉर्ड तक पहुंच चुका है। अब लक्ष्य जापान में होने वाली वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक जीतना है।
कभी स्कूल में शरारती बच्चे के तौर पर पहचाने जाने वाले सुहेल खान ने शायद उस वक्त नहीं सोचा होगा कि जिंदगी में आया वही मुश्किल दौर उन्हें एक ऐसी राह पर ले जाएगा, जहां आगे चलकर उनका नाम देश के सबसे सफल कूडो खिलाड़ियों में गिना जाएगा।
मध्य प्रदेश के सागर से ताल्लुक रखने वाले सुहेल आज कूडो के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी हैं और ‘गोल्डन बॉय ऑफ मध्य प्रदेश’ के नाम से भी पहचाने जाते हैं। मार्शल आर्ट की दुनिया में उनकी यात्रा पांचवीं कक्षा से शुरू हुई थी, लेकिन कूडो को उन्होंने पेशेवर तौर पर 2015 में अपनाया।
अपने सफर को याद करते हुए सुहेल बताते हैं कि पांचवीं कक्षा में स्कूल से करीब छह से आठ महीने के लिए निलंबित किया जाना उनके लिए बेहद कठिन समय था। स्कूल लौटने के बाद उन्हें यह महसूस होने लगा कि किसी भी शरारत के लिए सबसे पहले उनका ही नाम लिया जाता है। एक बच्चे के लिए वह अनुभव पीड़ादायक था, लेकिन इसी दौर ने उनके भीतर कुछ उत्पादक करने की इच्छा पैदा की। इसी दौरान उनकी मुलाकात कोच डॉ. मोहम्मद इजाज खान से हुई, जिन्होंने उन्हें मार्शल आर्ट की ओर जाने के लिए प्रेरित किया।
सुहेल को उस समय कराटे या किसी मार्शल आर्ट की औपचारिक जानकारी नहीं थी। उन्होंने सिर्फ फिल्मों और तस्वीरों में कुंग फू और कराटे देखा था। लेकिन एक सेल्फ-डिफेंस डेमोंस्ट्रेशन ने उनके भीतर जिज्ञासा पैदा कर दी।
उन्होंने देखा कि एक छोटा बच्चा भी आत्मरक्षा की तकनीकों का इस्तेमाल कर बड़े लोगों का सामना कर सकता है। यहीं से उनके भीतर मार्शल आर्ट सीखने की इच्छा मजबूत हुई और उन्होंने कराटे से अपनी यात्रा शुरू की।
कराटे से कूडो तक का सफर
सुहेल की मार्शल आर्ट यात्रा सिर्फ एक खेल तक सीमित नहीं रही। कराटे के बाद उन्होंने ताइक्वांडो और वुशू जैसे खेलों में भी हाथ आजमाया। अंततः 2015 में उन्होंने खुद को कूडो के लिए पूरी तरह समर्पित करने का फैसला किया।
उनके मुताबिक, कूडो जापान से जुड़ा एक कॉम्बैट स्पोर्ट है, जिसमें अलग-अलग मार्शल आर्ट विधाओं की तकनीकों का मिश्रण देखने को मिलता है। इसमें कराटे, बॉक्सिंग, ताइक्वांडो, जूडो, किक बॉक्सिंग, स्ट्राइकिंग, एल्बो, नी और ग्राउंड गेम जैसी तकनीकों का इस्तेमाल होता है। वह इसे आधुनिक दौर का ऐसा मार्शल आर्ट बताते हैं जिसमें मुकाबले के कई पहलुओं को एक साथ शामिल किया गया है।
सुहेल के अनुसार, भारत में कूडो को बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार और मेहुल वोरा के प्रयासों से बढ़ावा मिला। उनका कहना है कि भारत में इस खेल को लाने के पीछे आत्मरक्षा, खासकर महिलाओं की सेल्फ-डिफेंस, को बढ़ावा देने की सोच भी महत्वपूर्ण थी।
सुहेल का दावा है कि कूडो देश के 28 राज्यों तक पहुंच चुका है और विभिन्न जिलों व कस्बों में इसका प्रशिक्षण और प्रतिस्पर्धाएं होती हैं। उनके अनुसार, यह खेल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त है और आने वाले समय में वह इसे मुख्यधारा के खेल के रूप में और अधिक मजबूत होते देखने की उम्मीद रखते हैं।
2017 में देश के लिए पहला जूनियर वर्ल्ड मेडल
2015 में कूडो को पेशेवर तौर पर अपनाने के बाद सुहेल ने राज्य, जिला, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू किया। 2017 उनके करियर के लिए खास साल रहा, जब उन्होंने भारत के लिए जूनियर कूडो वर्ल्ड चैंपियनशिप में पदक जीता। इसके बाद उनका सफर लगातार आगे बढ़ता गया। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतने के साथ-साथ उन्हें कई सम्मान भी मिले। आज वह खुद को देश के सबसे अनुभवी और सफल कूडो खिलाड़ियों में स्थापित कर चुके हैं।
उनकी सबसे बड़ी पहचान उनके राष्ट्रीय स्तर के प्रदर्शन से बनी है। सुहेल के अनुसार, उन्होंने लगातार 23 बार नेशनल गोल्ड मेडल जीता है। उनका दावा है कि सभी खेलों को मिलाकर भारत में लगातार इतने नेशनल गोल्ड जीतने का रिकॉर्ड उनके नाम है।
उन्होंने यह भी बताया कि उनका राष्ट्रीय स्तर का फाइट रिकॉर्ड 105 मुकाबलों में 105 जीत और शून्य हार का है। सुहेल के मुताबिक, लगातार नेशनल गोल्ड के मामले में उनके बाद दूसरा सबसे लंबा रिकॉर्ड 18 लगातार नेशनल गोल्ड का है। वह इस उपलब्धि को अपने लिए बड़ी जिम्मेदारी भी मानते हैं और कहते हैं कि उनका रिकॉर्ड आगे भी बढ़ता रहे, यही उनकी कोशिश है।
3.30 सेकंड में नॉकआउट का दावा
कूडो में सुहेल की एक और बड़ी उपलब्धि उनका तेज नॉकआउट है। उन्होंने बताया कि पुणे में आयोजित चौथी नेशनल चैंपियनशिप के दौरान उन्होंने करीब 3.30 सेकंड में मुकाबला खत्म किया था। सुहेल के अनुसार, यह भारत में कूडो के सबसे तेज नॉकआउट में से एक था और उस प्रदर्शन ने उनके करियर में एक और खास माइलस्टोन जोड़ा। उनका कहना है कि उस दिन राजस्थान के एक खिलाड़ी के खिलाफ मुकाबले में उन्हें यह उपलब्धि हासिल हुई। हालांकि मुकाबले के आंकड़ों और रिकॉर्ड की आधिकारिक पुष्टि संबंधित खेल संस्था के रिकॉर्ड से ही की जा सकती है, लेकिन सुहेल के लिए वह पल उनके खेल करियर की यादगार उपलब्धियों में शामिल है।
‘मैं यहां सिर्फ हिस्सा लेने नहीं, जीतने आता हूं’
राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में उतरने से पहले खिलाड़ियों पर दबाव स्वाभाविक है। सुहेल भी मानते हैं कि मुकाबले से पहले नर्वसनेस रहती है। उनके दिमाग में यह सवाल रहता है कि प्रदर्शन कैसा होगा, परिस्थितियां कैसी होंगी और माहौल किस तरह का होगा। लेकिन इन तमाम सवालों के बीच उनका मूल मंत्र स्पष्ट है उन्हें अपने खेल में सर्वश्रेष्ठ बनना है। चाहे राज्य स्तरीय प्रतियोगिता हो, राष्ट्रीय चैंपियनशिप या अंतरराष्ट्रीय मुकाबला, सुहेल का कहना है कि वह सिर्फ भाग लेने के लिए नहीं उतरते। उनका लक्ष्य जीतना और अपने खेल पर हावी रहना होता है। इसी मानसिकता के साथ वह हर टूर्नामेंट में उतरते हैं।
परिवार को मनाने से लेकर आलोचनाओं का सामना करने तक
भारत में खेलों को लेकर पारंपरिक सोच आज भी कई परिवारों में एक बड़ी चुनौती है। सुहेल ने भी इस मानसिकता का सामना किया। सागर जैसे शहर में उनके सामने यह सवाल बार-बार आया कि खेल को करियर बनाकर आखिर भविष्य क्या होगा। उनका कहना है कि शुरुआत में परिवार को यह समझाना पड़ा कि वह खेल में अच्छा कर रहे हैं और उन्हें इसे जारी रखने का मौका मिलना चाहिए। जब उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने शुरू किए और उनके कोचों ने भी परिवार को समझाया कि सुहेल इस क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं, तब परिवार का समर्थन और मजबूत हुआ।
इसके बावजूद उन्हें लोगों की टिप्पणियों और तानों का सामना करना पड़ा। कई लोगों ने पूछा कि कूडो से वह आखिर क्या कर पाएंगे, जबकि बहुत से लोग इस खेल का नाम तक नहीं जानते थे। कुछ लोगों ने यह सवाल भी उठाया कि कूडो ओलंपिक खेल नहीं है और इससे नौकरी या करियर कैसे बनेगा। सुहेल का जवाब बहस करने के बजाय प्रदर्शन करने का रहा। उनका मानना है कि लोग बातें करते रहेंगे, लेकिन खिलाड़ी का काम अपने प्रदर्शन के जरिए जवाब देना है। इसी सोच के साथ उन्होंने आलोचनाओं को पीछे छोड़ते हुए अपना सफर जारी रखा।
खेल से भी बन सकता है करियर
सुहेल भारतीय समाज की उस धारणा को बदलने की जरूरत महसूस करते हैं जिसमें पढ़ाई को ही सुरक्षित भविष्य का एकमात्र रास्ता माना जाता है। उनके मुताबिक, 21वीं सदी में यह सोच बदलनी चाहिए कि केवल पढ़ाई करने से ही भविष्य सुरक्षित हो सकता है। उनका कहना है कि खेलों में भी बच्चों के लिए करियर की बड़ी संभावनाएं हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाले खिलाड़ी सरकारी नौकरियों, छात्रवृत्तियों और अन्य अवसरों तक पहुंच बना रहे हैं।
वह चाहते हैं कि खेलों की यह तस्वीर छोटे शहरों, कस्बों और गांवों तक पहुंचे। उनके मुताबिक, जब किसी छोटे शहर का बच्चा अपने ही आसपास किसी खिलाड़ी को सफलता हासिल करते देखता है, तो उसके भीतर भी यह विश्वास पैदा होता है कि वह ऐसा कर सकता है। सुहेल ने अपने गृह शहर सागर और मध्य प्रदेश के उदाहरण का जिक्र करते हुए कहा कि स्थानीय स्तर पर सफल खिलाड़ियों के उदाहरण नई पीढ़ी को प्रेरित कर सकते हैं। उन्होंने महिला क्रिकेटर क्रांति गौड़ जैसे उदाहरणों का भी उल्लेख किया, जिनकी उपलब्धियां छोटे शहरों के बच्चों को प्रेरित कर सकती हैं। उनका मानना है कि ऐसे उदाहरण सरकार के समर्थन, समाज की पहल और खेलों को लेकर बदलती सोच के साथ मिलकर देश में स्पोर्ट्स इंडस्ट्री को और बड़ा बना सकते हैं।
सोशल मीडिया पर सुहेल की अलग सोच
आज के दौर में खिलाड़ियों के लिए सोशल मीडिया अपनी पहचान बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। सुहेल भी मानते हैं कि Instagram, Facebook और दूसरे प्लेटफॉर्म खिलाड़ियों को बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचने का अवसर देते हैं। लेकिन सोशल मीडिया को लेकर उनका नजरिया थोड़ा अलग है। उनका कहना है कि खिलाड़ी का प्राथमिक काम खिलाड़ी बने रहना है, न कि पूरा समय इंफ्लुएंसर बनने में लगा देना।
उनके मुताबिक, अगर कोई खिलाड़ी लगातार वीडियो बनाने, पोस्ट तैयार करने और सोशल मीडिया के लिए कंटेंट बनाने में समय लगाएगा, तो उसकी ट्रेनिंग प्रभावित हो सकती है। वह खुद भी इस संतुलन को लेकर सतर्क रहते हैं। हालांकि, वह मीडिया की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके मुताबिक, हर खिलाड़ी खुद अपनी कहानी लोगों तक नहीं पहुंचा सकता। इसलिए समाचार चैनलों, मीडिया संस्थानों और प्रकाशनों को ऐसे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को सामने लाना चाहिए जो अभी व्यापक पहचान नहीं बना पाए हैं।
उन्होंने नीरज चोपड़ा का उदाहरण देते हुए कहा कि किसी खिलाड़ी को पहचान मिलने में वर्षों की मेहनत लगती है, लेकिन आम दर्शक अक्सर उसे उस समय पहचानता है जब उसे किसी बड़े मंच पर सफलता मिलती है। उनके अनुसार, कोई खिलाड़ी एक दिन में स्टार नहीं बनता; उसकी सफलता के पीछे लंबे समय का संघर्ष होता है।
उतार-चढ़ाव के बीच जारी रही यात्रा
सुहेल अपनी यात्रा को ‘रॉक एंड रोल’ की तरह बताते हैं कभी ऊपर, कभी नीचे। उनके सामने ऐसे भी समय आए जब उन्हें लगा कि शायद अगला टूर्नामेंट उनका आखिरी टूर्नामेंट हो सकता है। इसकी एक बड़ी वजह आर्थिक दबाव था। कूडो में दूसरे लोकप्रिय खेलों की तुलना में कम आर्थिक अवसर होने के कारण टूर्नामेंट, ट्रेनिंग, यात्रा और अन्य खर्च जुटाना उनके लिए आसान नहीं था।
वह बताते हैं कि उनका परिवार मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से आता है। कई बार ऐसा होता था कि अगर अगले महीने टूर्नामेंट में जाना है तो परिवार को पैसे बचाकर उनकी यात्रा और प्रतियोगिता का खर्च उठाना पड़ता था। उनके अनुसार, आज कूडो जैसे खेलों में टूर्नामेंट फीस और अन्य खर्च काफी बढ़ चुके हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि कुछ प्रतियोगिताओं में एंट्री फीस ही हजारों रुपये तक पहुंच जाती है। इसके बावजूद उन्होंने खेल नहीं छोड़ा।
स्पोर्ट्स कोटे से मिली सरकारी नौकरी
सुहेल के करियर में एक बड़ा मोड़ तब आया जब उन्हें स्पोर्ट्स कोटे के जरिए आयकर विभाग में नौकरी मिली। वह वर्तमान में मुंबई में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में कार्यरत हैं। उनके अनुसार, भारत सरकार खेल उपलब्धियों के आधार पर खिलाड़ियों को स्पोर्ट्स कोटे के तहत सरकारी नौकरी का अवसर देती है। इसमें सामान्य शैक्षणिक अंकों के बजाय पिछले वर्षों की खेल उपलब्धियां और पदक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों के लिए मेरिट के आधार पर चयन होता है। सुहेल का कहना है कि ऐसी नौकरियों की संख्या पहले की तुलना में बढ़ी है, लेकिन खिलाड़ियों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। उनका मानना है कि हर खिलाड़ी को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती, इसलिए राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों के लिए भी अलग समर्थन व्यवस्था होनी चाहिए। हर खिलाड़ी राष्ट्रीय पदक नहीं जीत सकता और हर राष्ट्रीय पदक विजेता अंतरराष्ट्रीय स्तर तक नहीं पहुंच पाता। इसके बावजूद इन खिलाड़ियों की वर्षों की मेहनत को देखते हुए उन्हें छात्रवृत्ति और अन्य सहायता मिलनी चाहिए।
‘हर खिलाड़ी को नौकरी नहीं, लेकिन सपोर्ट सिस्टम जरूर चाहिए’
सुहेल के मुताबिक, सरकार से खिलाड़ियों को सिर्फ नौकरी के जरिए सहायता देने के बजाय प्रशिक्षण, छात्रवृत्ति और प्रतियोगिताओं के खर्च में भी मदद मिलनी चाहिए। उनका तर्क है कि राष्ट्रीय स्तर पर हजारों खिलाड़ी प्रतिस्पर्धा करते हैं, लेकिन पदक सिर्फ कुछ खिलाड़ियों को मिलते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि बाकी खिलाड़ी कम मेहनत कर रहे हैं। कई बार प्रदर्शन के बीच अंतर कुछ सेकंड या बहुत छोटे अंतर का होता है। इसीलिए उनका मानना है कि खेलों के लिए व्यापक सपोर्ट सिस्टम की जरूरत है, ताकि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की तैयारी करने वाले खिलाड़ियों को आर्थिक कारणों से पीछे न हटना पड़े।
23 नेशनल गोल्ड के बाद भी खुद के खर्च पर ट्रेनिंग
सुहेल की कहानी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर इतनी सफलता हासिल करने के बावजूद उनकी ट्रेनिंग और यात्रा का बड़ा हिस्सा अब तक निजी खर्च से चलता रहा है। उन्होंने बताया कि सागर हो या मुंबई, उनकी ट्रेनिंग, डाइट और यात्रा के खर्च का भुगतान उन्होंने खुद किया है। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में जाने के लिए भी उन्हें कई बार अपनी जेब से खर्च करना पड़ा।
उनके मुताबिक, जब कोई खिलाड़ी भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए वर्ल्ड चैंपियनशिप जैसे बड़े टूर्नामेंट में जाता है, तब भी यात्रा, रहने, खाने और प्रतियोगिता से जुड़े कई खर्च सामने आते हैं। उन्होंने बताया कि कूडो का पूरा किट भी महंगा होता है, जिसमें हेड गियर, यूनिफॉर्म और ग्लव्स जैसी चीजें शामिल हैं। उनके अनुसार, कूडो का पूरा किट करीब डेढ़ लाख रुपये तक का हो सकता है।
उन्होंने कहा कि कूडो से जुड़े कुछ अधिकारियों और पदाधिकारियों ने किट जैसी चीजों में सहायता की है, लेकिन फ्लाइट टिकट, बोर्डिंग, टूर्नामेंट फीस और दूसरे खर्चों को जुटाना अब भी बड़ी चुनौती है। सुहेल ने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के उदाहरण देते हुए बताया कि किसी खिलाड़ी का कुल खर्च कई लाख रुपये तक पहुंच सकता है। उनके मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का खर्च कई बार करीब 25 लाख रुपये तक पहुंच जाता है। इसी वजह से वह ऐसे प्रायोजकों की तलाश में हैं जो प्रतिभाशाली कूडो खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ने में मदद कर सकें।
अक्षय कुमार से मुलाकात और खास रिश्ता
कूडो से जुड़ा होने के कारण सुहेल को बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार से मिलने का भी मौका मिला है। उनके अनुसार, अक्षय कुमार भारत में कूडो को बढ़ावा देने वाले प्रमुख लोगों में शामिल हैं। सुहेल ने बताया कि अक्षय कुमार और मेहुल वोरा ने भारत में कूडो को आगे बढ़ाने की दिशा में काम किया। उनके अनुसार, खेल को भारत में लाने के पीछे सेल्फ-डिफेंस को बढ़ावा देना भी एक प्रमुख विचार था।
सुहेल के मुताबिक, जब खिलाड़ियों को राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता मिलती है, तो उन्हें अक्षय कुमार से मिलने का अवसर मिलता है। उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी में चयन के बाद अक्षय कुमार से हुई मुलाकात को भी यादगार बताया। उनके अनुसार, अक्षय कुमार ने खिलाड़ियों को बुलाकर बधाई दी थी और उनके साथ बातचीत की थी। सुहेल कहते हैं कि उनके साथ बैठकर बात करने पर उन्हें अलग तरह की ऊर्जा महसूस होती है।
‘India’s Top 1%’ शो में अनिल कपूर के साथ मंच साझा किया
खेल के अलावा सुहेल को हाल ही में मनोरंजन और क्विज शो के मंच पर भी नजर आने का मौका मिला। उन्होंने बताया कि वह अनिल कपूर द्वारा होस्ट किए जा रहे शो ‘India’s Top 1%’ का हिस्सा बने। उनके अनुसार, यह लॉजिकल और रीजनिंग आधारित शो है, जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों और पेशों से जुड़े लोगों को शामिल किया जाता है। शो में प्रतिभागियों के सामने सवाल और चुनौतियां रखी जाती हैं और सही जवाबों के आधार पर बड़ी इनामी राशि जीतने का अवसर मिलता है।
सुहेल ने बताया कि अगर प्रतिभागी सभी 13 सवालों के सही जवाब देता है तो एक करोड़ रुपये तक की राशि जीत सकता है। उनके लिए यह अनुभव इसलिए भी खास था क्योंकि खेल के बाहर इस तरह के रीजनिंग और क्विज सवाल उनके लिए नई चीज थे। उन्होंने इसे सीखने का अनुभव बताया और कहा कि अनिल कपूर के साथ मंच साझा करना उनके लिए सौभाग्य की बात थी।
खेल के बाहर घूमना, एडवेंचर और खाना पसंद
लगातार ट्रेनिंग और प्रतियोगिताओं के बीच सुहेल अपने शौक के लिए भी समय निकालते हैं। उन्हें यात्रा करना और एडवेंचर पसंद है। वह भविष्य में बंजी जंपिंग, पैराग्लाइडिंग जैसी गतिविधियों को और ज्यादा आजमाना चाहते हैं। उन्हें खाना भी पसंद है, हालांकि खिलाड़ी होने के कारण डाइट का ध्यान रखना पड़ता है। दिल्ली आने पर उन्होंने छोले भटूरे, पापड़ी चाट और कुछ नॉनवेज व्यंजनों का स्वाद लिया। उनका कहना है कि टूर्नामेंट के दौरान डाइट पर ज्यादा नियंत्रण रहता है, लेकिन प्रतियोगिताओं से बाहर निकलने के बाद वह अपनी पसंद का खाना खाने का आनंद लेते हैं।
अगला लक्ष्य: जापान में वर्ल्ड चैंपियनशिप का गोल्ड
अब सुहेल की नजर अपने करियर के सबसे बड़े लक्ष्य पर है वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारत के लिए स्वर्ण पदक। उन्होंने बताया कि 2023/25 की वर्ल्ड चैंपियनशिप में उन्होंने बुल्गारिया में सिल्वर मेडल हासिल किया था।
अब उनका लक्ष्य जापान में होने वाली अगली वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक जीतना है। वह इसे अपने करियर का सबसे बड़ा माइलस्टोन मानते हैं। उनका कहना है कि टीम कड़ी मेहनत कर रही है और उन्हें विश्वास है कि वह इस लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं। उनकी महत्वाकांक्षा सिर्फ खुद तक सीमित नहीं है। वह चाहते हैं कि भारत के लिए कूडो में विश्व स्तर का स्वर्ण पदक आए और इस उपलब्धि में उनका नाम दर्ज हो।
सागर में खिलाड़ियों के लिए खोलना चाहते हैं ट्रेनिंग सेंटर
सुहेल का भविष्य का एक और बड़ा सपना अपने गृह शहर सागर से जुड़ा है। वह वहां ऐसा एनजीओ, डोजो या एक्सीलेंस सेंटर स्थापित करना चाहते हैं जहां आर्थिक परेशानियों के कारण खेल छोड़ने वाले प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को सहायता दी जा सके। उनका कहना है कि उन्होंने ऐसे कई खिलाड़ियों को देखा है जो उनसे भी बेहतर प्रतिभा रखते थे, लेकिन परिस्थितियों और आर्थिक समस्याओं के कारण उन्हें खेल छोड़ना पड़ा।
वह नहीं चाहते कि भविष्य में किसी खिलाड़ी को सिर्फ इसलिए अपना सपना छोड़ना पड़े क्योंकि उसके पास प्रशिक्षण या प्रतियोगिता के लिए पैसे नहीं हैं। उनकी योजना है कि सागर में ऐसा सेंटर बनाया जाए जहां खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग दी जा सके। जरूरतमंद खिलाड़ियों के लिए फंडिंग और स्पॉन्सरशिप की व्यवस्था की जाए और उन्हें मुफ्त प्रशिक्षण दिया जाए। उनका लक्ष्य अपने शहर में ऐसी सुविधाएं तैयार करना है, जिनके लिए आज उन्हें खुद सागर से बाहर जाकर प्रशिक्षण लेना पड़ता है।
खिलाड़ी से आगे बढ़कर अगली पीढ़ी के लिए रास्ता बनाने की कोशिश
सुहेल खान की कहानी सिर्फ लगातार पदक जीतने वाले एक खिलाड़ी की कहानी नहीं है। यह उस संघर्ष की कहानी भी है जिसमें एक छोटे शहर का खिलाड़ी पारंपरिक सोच, आर्थिक सीमाओं, सीमित पहचान और संसाधनों की कमी के बावजूद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने की कोशिश करता है।
पांचवीं कक्षा में स्कूल से निलंबन के बाद मार्शल आर्ट की तरफ बढ़ा एक बच्चा आज 23 लगातार नेशनल गोल्ड मेडल का दावा करने वाला खिलाड़ी है। कराटे से शुरू हुई यात्रा ताइक्वांडो और वुशू से होते हुए कूडो तक पहुंची। 2017 में जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप का पदक, तेज नॉकआउट, 105-0 का राष्ट्रीय फाइट रिकॉर्ड, सरकारी नौकरी और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान—यह सफर कई पड़ावों से होकर गुजरा है।
लेकिन सुहेल के लिए सफर अभी खत्म नहीं हुआ है। उनकी नजर जापान की वर्ल्ड चैंपियनशिप पर है, जहां वह भारत के लिए कूडो का पहला वर्ल्ड गोल्ड जीतने का लक्ष्य लेकर उतरना चाहते हैं। इसके साथ ही उनका सपना अपने शहर सागर में ऐसा खेल केंद्र तैयार करने का है जहां अगली पीढ़ी के खिलाड़ियों को वह संघर्ष न करना पड़े, जिससे उन्हें खुद गुजरना पड़ा। सुहेल की सोच का सार उनके अपने शब्दों में यही है कि लोगों के ताने और सवाल चलते रहेंगे, लेकिन खिलाड़ी का जवाब उसका काम और उसका प्रदर्शन होना चाहिए। राष्ट्रीय स्तर पर 23 लगातार स्वर्ण पदकों के बाद अब उनका अगला जवाब विश्व मंच पर भारत के लिए स्वर्ण पदक के रूप में देने का लक्ष्य है।