नई दिल्ली।
मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब वैश्विक तेल बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। कई साल बाद कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति के कारण तेल आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। इसी कारण बाजार में कीमतें तेजी से चढ़ रही हैं।
ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई दोनों महंगे
अंतरराष्ट्रीय बाजार में Brent Crude और West Texas Intermediate दोनों की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रविवार को ब्रेंट क्रूड लगभग 108.68 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। वहीं डब्ल्यूटीआई करीब 108 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता देखा गया।
एक ही दिन में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 18 प्रतिशत बढ़ी। वहीं डब्ल्यूटीआई में लगभग 20 प्रतिशत का उछाल आया। यह वृद्धि बाजार में बढ़ती चिंता को दिखाती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना चिंता का केंद्र
विशेषज्ञों के अनुसार तेल बाजार में यह उछाल मुख्य रूप से Strait of Hormuz में पैदा हुई स्थिति के कारण है। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में गिना जाता है।अरब सागर और फारस की खाड़ी को जोड़ने वाला यह रास्ता वैश्विक तेल व्यापार के लिए बेहद अहम है। दुनिया के करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल और द्रवीकृत गैस की आपूर्ति रोज इसी रास्ते से गुजरती है।इसी वजह से इसे कई बार वैश्विक ऊर्जा का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है।
ईरान की चेतावनी से बढ़ी चिंता
रिपोर्टों के अनुसार Iran की सैन्य इकाई Islamic Revolutionary Guard Corps ने इस क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों को चेतावनी देना शुरू किया है।यह कदम तब उठाया गया जब 28 फरवरी के बाद United States और Israel के साथ तनाव तेज हो गया। इसके बाद कई तेल टैंकरों पर हमले की घटनाएं भी सामने आई हैं।
ब्रिटेन की समुद्री निगरानी संस्था UK Maritime Trade Operations के अनुसार 28 फरवरी से अब तक कम से कम दस तेल टैंकरों को निशाना बनाया जा चुका है।
पहले भी युद्ध से बढ़ी थीं कीमतें
इससे पहले भी वैश्विक संघर्षों के दौरान तेल की कीमतों में बड़ा उछाल देखा गया था। साल 2022 में Russia Ukraine War शुरू होने के बाद भी कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मध्य पूर्व में तनाव जारी रहता है तो तेल बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है। इसका असर दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं और ईंधन कीमतों पर भी पड़ सकता है।