अदालतों में बढ़ती महिलाओं की ताकत

Story by  अर्सला खान | Published by  [email protected] | Date 08-03-2026
International Women's Day: The strong voices of women resonate in the courts
International Women's Day: The strong voices of women resonate in the courts

 

अर्सला खान/नई दिल्ली

हर साल 8 मार्च को मनाया जाने वाला International Women's Day केवल एक प्रतीकात्मक दिन नहीं है। यह उन कहानियों को सामने लाने का अवसर है जो बदलाव की दिशा दिखाती हैं। दुनिया के कई हिस्सों में महिलाएं ऐसे क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं जिन्हें कभी पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। न्यायपालिका भी उनमें से एक है। अदालतों के शांत गलियारों में अब महिलाओं की मौजूदगी पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।

भारत से लेकर अमेरिका तक कई महिलाएं कानून और न्याय के क्षेत्र में नई पहचान बना रही हैं। उनके फैसले, उनका संघर्ष और उनकी मेहनत आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता तैयार कर रहे हैं। भारत की न्यायपालिका इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। देश के सर्वोच्च न्यायालय Supreme Court of India में अब तक कुल 11 महिलाएं जज के रूप में नियुक्त हो चुकी हैं। यह संख्या भले अभी कम लगे, लेकिन इसकी शुरुआत एक ऐतिहासिक कदम से हुई थी।

साल 1989 में M. Fathima Beevi सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला जज बनीं। उस समय यह नियुक्ति केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं थी। यह भारतीय न्याय व्यवस्था में एक नए दौर की शुरुआत थी। इसके बाद धीरे धीरे अन्य महिलाएं भी इस शीर्ष अदालत तक पहुंचीं।

 

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

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साल 1994 में Sujata Manohar को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया गया। वर्ष 2000 में Ruma Pal ने न्यायालय में अपनी जगह बनाई। इसके बाद 2010 में Gyan Sudha Misra और 2011 में Ranjana Prakash Desai को सुप्रीम कोर्ट की जज बनाया गया।

 

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

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वर्ष 2014 में R. Banumathi की नियुक्ति हुई। इसके बाद 2018 में दो महिलाओं ने एक साथ सुप्रीम कोर्ट में प्रवेश किया। इनमें Indu Malhotra और Indira Banerjee शामिल थीं।

साल 2021 भारतीय न्यायपालिका के लिए एक और महत्वपूर्ण वर्ष रहा। इस साल तीन महिलाओं को सुप्रीम कोर्ट में जज बनाया गया। इनमें Hima Kohli, Bela M. Trivedi और B. V. Nagarathna शामिल हैं। इन नियुक्तियों ने यह संकेत दिया कि न्यायपालिका के उच्च पदों पर महिलाओं की भागीदारी धीरे धीरे मजबूत हो रही है।

 

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

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दूसरी ओर दुनिया के दूसरे देशों में भी ऐसी ही प्रेरक घटनाएं सामने आ रही हैं। अमेरिका के न्यू जर्सी राज्य में भारतीय मूल की वकील Lubna Qazi Chowdhry ने हाल ही में इतिहास रचा है। वह न्यू जर्सी की पहली मुस्लिम महिला प्रशासनिक कानून जज बनी हैं।

 

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

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लुबना काज़ी का परिवार भारतीय मूल से जुड़ा है। उनके परिवार की जड़ें महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के कोंकण क्षेत्र से मानी जाती हैं। बचपन से ही उनके घर में शिक्षा और मेहनत को महत्व दिया जाता था। यही माहौल आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की नींव बना।

उन्होंने अमेरिका में कानून की पढ़ाई पूरी की और धीरे धीरे अपने पेशेवर जीवन को आगे बढ़ाया। अपने करियर के दौरान उन्होंने नागरिक अधिकारों, पारिवारिक कानून और स्वास्थ्य से जुड़े मामलों पर काम किया। उनके सहयोगियों के अनुसार वह कानून को केवल नियमों का ढांचा नहीं मानतीं। उनके लिए यह समाज की सेवा का एक जिम्मेदार माध्यम है।

उनकी योग्यता और अनुभव को देखते हुए न्यू जर्सी के गवर्नर Phil Murphy ने 6 जनवरी 2026 को उन्हें प्रशासनिक कानून जज के पद के लिए नामित किया। इसके बाद New Jersey State Senate ने उनके नाम को मंजूरी दी। 22 जनवरी 2026 को उन्होंने आधिकारिक रूप से पद की शपथ ली।

शपथ के दौरान उन्होंने पवित्र कुरआन पर हाथ रखकर संविधान और न्याय के सिद्धांतों के प्रति निष्ठा व्यक्त की। फिलहाल वह नेवार्क शहर में अपनी जिम्मेदारियां निभा रही हैं। प्रशासनिक कानून जज के रूप में वह सरकारी एजेंसियों से जुड़े विवादों और अपील से संबंधित मामलों की सुनवाई करती हैं।

लुबना काज़ी की एक और खासियत उनकी बहुभाषी क्षमता है। वह अंग्रेजी के साथ उर्दू, हिंदी और कोंकणी भी जानती हैं। इससे उन्हें अलग अलग सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोगों से संवाद करने में आसानी होती है।

आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर जब दुनिया महिलाओं की उपलब्धियों को याद कर रही है, तब अदालतों की ये कहानियां एक स्पष्ट संदेश देती हैं। न्याय की मेज पर अब केवल पुरुषों की आवाज नहीं है। वहां महिलाओं की सोच, अनुभव और संवेदनशीलता भी शामिल हो रही है। यही बदलाव भविष्य की न्याय व्यवस्था को अधिक संतुलित और मानवीय बनाने की उम्मीद जगाता है।