नई दिल्ली।
बॉलीवुड के सुपरस्टार सलमान खान और हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना से जुड़ा एक दिलचस्प और भावुक किस्सा एक बार फिर चर्चा में है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सलमान खान ने कभी राजेश खन्ना के मशहूर बंगले आशीर्वाद को खरीदने के लिए मदद के तौर पर बिना फीस अपनी फिल्म में काम करने का ऑफर दिया था।
बताया जाता है कि 1960 और 1970 के दशक के अंत में, जब राजेश खन्ना का करियर ढलान पर था, तब वे गंभीर आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे थे। उसी दौर में सलमान खान ने कथित तौर पर यह प्रस्ताव रखा कि वे ‘आशीर्वाद’ बंगला खरीदने में मदद करेंगे और बदले में राजेश खन्ना की फिल्म में मुफ़्त में अभिनय भी करेंगे। हालांकि, रिपोर्ट्स के अनुसार, राजेश खन्ना ने सलमान के इरादों पर शक जताया और इसे धोखाधड़ी समझ लिया। उनका मानना था कि सलमान उन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर करना चाहते हैं।
जानकारी के मुताबिक, राजेश खन्ना ने 1970 के दशक की शुरुआत में अभिनेता राजेंद्र कुमार से यह बंगला महज़ 3.5 लाख रुपये में खरीदा था। यह बंगला जल्द ही उनकी शोहरत और रुतबे का प्रतीक बन गया। राजेश खन्ना ने 1969 से 1972 के बीच लगातार 15 सोलो हिट फिल्में देकर ऐसा रिकॉर्ड बनाया, जो आज तक कायम है। अपने करियर के शिखर पर उन्होंने अकूत संपत्ति और प्रतिष्ठा अर्जित की।
अपनी चर्चित किताब डार्क स्टार: द लोनलीनेस ऑफ़ बीइंग राजेश खन्ना में लेखक गौतम चिंतामणि लिखते हैं कि ‘आशीर्वाद’ में राजेश खन्ना का शाही अंदाज़ था। वे ऊँची कुर्सी पर बैठते, प्रोड्यूसर्स को बाहर इंतज़ार कराते और रेशमी लुंगी-कुर्ते में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते थे। बंगले के भीतर जाने की इजाज़त सिर्फ़ चुनिंदा लोगों को होती थी, जबकि करीबी लोग वहां चलने वाली अंतहीन पार्टियों का हिस्सा बनते थे।
लेकिन समय बदला। 1973 में आई अमिताभ बच्चन की फिल्मों ज़ंजीर, शोले और दीवार ने सिनेमा का रुख बदल दिया और राजेश खन्ना का सितारा धीरे-धीरे ढलने लगा।
गौतम चिंतामणि के अनुसार, सलमान खान ने बाद में अपने भाई सोहेल खान के लिए भी यह बंगला खरीदने के कई प्रस्ताव दिए और यहां तक कहा कि वे बिना मेहनताना लिए फिल्म करेंगे ताकि इनकम टैक्स के बकाये चुकाए जा सकें। बावजूद इसके, राजेश खन्ना ने ‘आशीर्वाद’ नहीं बेचा और उसी घर में अकेले रहते हुए अपने जीवन के आख़िरी दिन बिताए।
बाद में यह बंगला किसी और ने खरीद लिया, उसे तोड़ दिया गया और उसकी जगह एक ऊंची इमारत खड़ी कर दी गई—लेकिन ‘आशीर्वाद’ और उससे जुड़े किस्से आज भी हिंदी सिनेमा के इतिहास में जिंदा हैं।






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