चुनाव आयोग का बदलता चेहरा: सेन से EVM तक

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 08-10-2026
The Evolving Face of the Election Commission: From Sen to EVMs
The Evolving Face of the Election Commission: From Sen to EVMs

 

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साकिब सलीम  

 26 जनवरी 1950 को जब भारत एक गणराज्य बना, तब दुनिया को यह विश्वास नहीं था कि इतनी कम साक्षरता दर वाली इतनी बड़ी आबादी विधायिका के लिए एक सफल चुनाव करा सकती है। लेकिन, भारत के निर्वाचन आयोग (ECI) ने 1952 से लगातार सफल चुनाव आयोजित कराकर भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनाए रखा है। 

 संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत 25 जनवरी 1950 को भारत के निर्वाचन आयोग का गठन किया गया था। एक आईसीएस (ICS) अधिकारी, सुकुमार सेन ने 21 मार्च 1950 को पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में कार्यभार संभाला।   उनके सामने खड़ी चुनौती अभूतपूर्व थी।

लगभग 36.5 करोड़ की आबादी में साक्षरता दर केवल 16.6% थी, जहाँ 17.2 करोड़ लोग मतदान करने के पात्र थे। मानव इतिहास में कभी भी इतनी बड़ी आबादी ने मतदान नहीं किया था।   एक साल से भी कम समय में निर्वाचन आयोग ने निर्वाचन क्षेत्रों का निर्माण किया, मतदाता सूचियाँ तैयार कीं, अधिकारियों को प्रशिक्षित किया और लाखों पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं को 1951-52 के पहले आम चुनाव में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। 

 सुकुमार सेन ने साबित कर दिया कि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की सफलता केवल साक्षरता पर निर्भर नहीं थी और यदि मतदान प्रणाली सरल और तटस्थ हो, तो आम भारतीय के पास सही विकल्प चुनने के लिए पर्याप्त राजनीतिक समझ थी। सेन ने 1952 और 1957 में पहले दो आम चुनावों का संचालन किया। 

 सेन की प्रतिष्ठा सीमाओं के पार भी पहुँची। 1953 में, सेन को सूडान के पहले संसदीय चुनावों के लिए सूडान चुनाव आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। इस प्रकार, सेन के नेतृत्व में भारत का निर्वाचन आयोग इस बात का एक अंतर्राष्ट्रीय उदाहरण बन गया कि कैसे एक नए स्वतंत्र और कम विकसित देश में लोकतंत्र का संचालन किया जा सकता है। 

 सेन के बाद, निर्वाचन आयोग असाधारण जन-ध्यान आकर्षित किए बिना भारत की संवैधानिक व्यवस्था का एक स्थायी हिस्सा बना रहा, जिस पर आगे चलकर सभी का ध्यान केंद्रित होने वाला था।   शुरुआत में आयोग एक एकल-सदस्यीय निकाय था। हालाँकि, मतदाताओं की संख्या और राजनीति की प्रतिस्पर्धी प्रकृति के साथ-साथ इसकी जिम्मेदारियों का भी विस्तार हुआ। 

 1960 और 1970 के दशक में एक-दल के प्रभुत्व में गिरावट और क्षेत्रीय शक्तियों का उदय देखा गया। 1970 के दशक की राजनीतिक उथल-पुथल और 1977 में कांग्रेस की हार ने यह साबित कर दिया कि चुनाव किसी देश की राजनीति को बदल सकते हैं।   

आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct), जिसकी शुरुआत 1960 में केरल में एक अनौपचारिक संहिता के रूप में हुई थी, प्रतिस्पर्धा तेज होने के साथ तेजी से महत्वपूर्ण होती गई। बाद में, 1988 में मतदान की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई, जिससे निर्वाचक मंडल का दायरा और बढ़ गया। 

 निर्वाचन आयोग की सार्वजनिक छवि में निर्णायक बदलाव टी.एन. शेशन के साथ आया।   शेशन 12 दिसंबर 1990 को मुख्य निर्वाचन आयुक्त बने और 11 दिसंबर 1996 तक इस पद पर रहे। उन्होंने दशकों से अस्तित्व में मौजूद एक संवैधानिक पद की शक्तियों का उपयोग करने के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया। 

 शेशन ने आदर्श आचार संहिता का इस्तेमाल केवल विनम्र सुझावों के रूप में नहीं, बल्कि चुनावी प्रशासन के एक व्यावहारिक साधन के रूप में किया। उन्होंने सरकारी तंत्र के दुरुपयोग, अत्यधिक चुनाव खर्च, अवैध प्रचार, बूथ कैप्चरिंग और चुनावों से जुड़ी अन्य कुरीतियों का कड़ा मुकाबला किया। चुनाव पर्यवेक्षकों का महत्व तेजी से बढ़ा, और 1996 में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 20B के माध्यम से उनके पद को वैधानिक समर्थन प्राप्त हुआ। 

 मतदाता पहचान पत्र (EPIC) की शुरुआत और विस्तार भी शेशन युग से ही जुड़ा हुआ है। इसके पीछे विचार यह था कि राज्य को पता होना चाहिए कि कौन मतदान कर रहा है और मतदाता को फर्जी मतदान (भेष बदलकर वोट देने) से बचाया जाना चाहिए।   खर्च की सीमाओं, मतदाताओं की पहचान, केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती और चुनावी नियमों के सख्त अनुपालन पर शेशन के जोर ने निर्वाचन आयोग को एक ऐसा दृश्यमान रूप दिया जो उसने पहले कभी नहीं देखा था। 

 फिर भी शेशन की सबसे बड़ी विरासत शायद मनोवैज्ञानिक रही होगी।   शेशन से पहले, राजनीतिक दल अक्सर चुनाव का पर्यवेक्षण करने वाली संस्था से बड़े दिखाई देते थे। शेशन के बाद, चुनाव आयोग स्वयं एक ऐसी राजनीतिक संस्था बन गया जो राजनीतिक दलों को अपना व्यवहार बदलने के लिए मजबूर करने में सक्षम थी।   

क्या टी.एन. शेशन ने भारतीय चुनावों को बदला या 1990 के दशक में सरकारों की राजनीतिक कमजोरी ने चुनाव आयोग के अधिकारों के शेशन द्वारा किए गए इस असाधारण प्रदर्शन को संभव बनाया—यह एक अधिक रोचक प्रश्न है?   शेशन दिसंबर 1990 में ऐसे समय में मुख्य निर्वाचन आयुक्त बने, जब केंद्र में एक-दल के प्रभुत्व का दौर समाप्त हो रहा था और उसकी जगह अल्पमत व गठबंधन सरकारें ले रही थीं। वी.पी. सिंह, चंद्रशेखर और 1991 के चुनाव के बाद पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकारें गठबंधन सहयोगियों पर निर्भर थीं।

राजनीतिक व्यवस्था तेजी से विखंडित हो रही थी और क्षेत्रीय दल महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन रहे थे।   अमित आहूजा और सुसान ओस्टरमैन ने शायद इस संबंध की सबसे स्पष्ट व्याख्या प्रस्तुत की है। उनका तर्क है कि एक-दल के प्रभुत्व का पतन एक शक्तिशाली निर्वाचन आयोग के उदय के लिए एक "आवश्यक, लेकिन पर्याप्त नहीं" शर्त थी। गठबंधन सरकारों ने कार्यकारी शक्ति को गठबंधन सहयोगियों के बीच विभाजित कर दिया और कई वीटो खिलाड़ी तैयार कर दिए।

परिणामस्वरूप, "कमजोर सरकारों द्वारा आयोग की स्वायत्तता को सीमित करने की संभावना कम हो गई"।   छोटे और क्षेत्रीय दल, जो राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासनिक तंत्र पर अविश्वास करते थे, वे आयोग को तेजी से एक तटस्थ मध्यस्थ के रूप में देखने लगे।   लेकिन, इससे शेशन की उपलब्धियों का महत्व कम नहीं होता।

बल्कि, यह बताता है कि उनका व्यक्तित्व इतना मायने क्यों रखता था। संविधान ने आयोग को पहले से ही काफी शक्तियाँ दी थीं, लेकिन शेशन ही वह मुख्य निर्वाचन आयुक्त थे जिन्होंने उनकी सीमाओं का परीक्षण करने का विकल्प चुना। डेविड गिलमार्टिन उनके इस प्रयास को "एक ऐसी चुनावी नैतिकता का निर्माण करने का प्रयास" बताते हैं जो रोज़मर्रा की राजनीति से परे थी। 

 यह एक युग-परिवर्तनकारी संयोग था कि जैसे-जैसे सरकारें कमजोर हुईं, निर्वाचन आयोग मजबूत होता गया। एक शक्तिशाली केंद्रीय बहुमत के पास शेशन जैसे मुखर मुख्य निर्वाचन आयुक्त का विरोध करने की अधिक राजनीतिक क्षमता हो सकती थी। लेकिन, गठबंधन सरकारों के पास ऐसे विकल्प कम थे। 

 शेशन ने गठबंधन युग का निर्माण नहीं किया था। गठबंधन युग ने उस राजनीतिक स्थान का निर्माण किया जिसमें शेशन, 'शेशन' बन सके। उनके व्यक्तित्व ने उस अवसर को एक संस्थागत परिवर्तन में बदल दिया, जिसके प्रभाव उनके सेवानिवृत्त होने के लंबे समय बाद तक जीवित रहे।   

अगली बड़ी क्रांति तकनीकी थी। ईवीएम (EVM) का पहली बार प्रायोगिक तौर पर उपयोग 1982 में किया गया था और 2004 के आम चुनाव में सभी 543 लोकसभा क्षेत्रों में इन्हें तैनात किया गया था। बाद में एक अतिरिक्त पेपर ट्रेल प्रदान करने के लिए वीवीपीएटी (VVPAT) तकनीक पेश की गई। 2024 में, सर्वोच्च न्यायालय ने मौजूदा सुरक्षा उपायों को बनाए रखते हुए 100 प्रतिशत वीवीपीएटी सत्यापन की मांग को खारिज कर दिया।   

अदालतों ने भी चुनाव प्रशासन को तेजी से आकार दिया है। 2023 के 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ' मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि जब तक संसद अनुच्छेद 324(2) के तहत कानून नहीं बनाती, तब तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्तियाँ प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की एक समिति की सिफारिश पर की जानी चाहिए। 

 इसके बाद संसद ने 2023 का कानून पारित किया। इसने चयन समिति से सीजेआई (CJI) को हटाकर उनके स्थान पर प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया, जिसमें प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता भी शामिल हैं।

इसने 6 वर्ष का कार्यकाल या 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, निर्धारित की।   23 सितंबर 2026 को, सर्वोच्च न्यायालय की दो न्यायाधीशों की पीठ ने 2023 के नियुक्ति कानून की चुनौती पर भिन्न राय दी और निर्देश दिया कि इस मामले को एक बड़ी संविधान पीठ के विचारार्थ मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए। इस प्रकार, अक्टूबर 2026 तक, कानून लागू है, लेकिन नियुक्ति प्रक्रिया की स्वतंत्रता को लेकर संवैधानिक बहस अनसुलझी बनी हुई है। 

 निर्वाचन विधि (संशोधन) अधिनियम, 2021 ने अन्य महत्वपूर्ण बदलाव किए, जिनमें मतदाता पंजीकरण के लिए एक वर्ष में चार अर्हता तिथियाँ प्रदान करना और मतदाता सूची की प्रविष्टियों के आधार प्रमाणीकरण के लिए एक वैधानिक ढांचा तैयार करना शामिल है।   सुकुमार सेन से टी.एन. शेशन तक और बैलेट पेपर से ईवीएम तक, भारत के निर्वाचन आयोग का इतिहास एक बदलते गणराज्य के अनुकूल खुद को ढालना सीखने वाली संस्था का इतिहास है।