हैदराबाद।
मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (MANUU) के एच.के. शेरवानी सेंटर फॉर डेक्कन स्टडीज की ओर से “दक्कन की वस्त्र परंपराएं: सामग्री, श्रम और तकनीक” विषय पर राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया गया। इसमें दक्कन क्षेत्र की समृद्ध वस्त्र विरासत, पारंपरिक बुनाई की तकनीकों, कारीगर समुदायों के योगदान और हस्तशिल्प के संरक्षण से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई।
सेमिनार का मुख्य उद्देश्य वस्त्रों को क्षेत्र की भौतिक संस्कृति और ऐतिहासिक अनुभव के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में समझना था। इस दौरान वस्त्र उत्पादन, कारीगर समुदायों, पारंपरिक ज्ञान, श्रम और तकनीकी प्रक्रियाओं के बीच संबंधों पर विशेष ध्यान दिया गया। कार्यक्रम ने शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों को दक्कन की वस्त्र परंपराओं के विकास, बुनकर समुदायों के कौशल तथा समकालीन समय में पारंपरिक हस्तशिल्प को संरक्षित करने की जरूरत पर विचार साझा करने का अवसर प्रदान किया।
सेमिनार के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता MANUU के कुलपति प्रो. सैयद ऐनुल हसन ने की। तेलंगाना सरकार के युवा विकास, पर्यटन एवं संस्कृति विभाग की विशेष मुख्य सचिव ए. वाणी प्रसाद, आईएएस, मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। वस्त्र कला के पुनरुद्धार के क्षेत्र में सक्रिय उज्रम्मा बिलग्रामी विशिष्ट अतिथि थीं।
हैदराबाद विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रो. संजय सुभोद ने मुख्य वक्तव्य दिया। सेमिनार में दक्कन की पारंपरिक वस्त्र कला के ऐतिहासिक विकास और इससे जुड़े सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहलुओं पर विचार प्रस्तुत किए गए।
समापन सत्र में MANUU के रजिस्ट्रार प्रो. इश्तियाक अहमद मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। पद्मश्री से सम्मानित और यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त मास्टर बुनकर गजम गोवर्धन विशिष्ट अतिथि थे। हैदराबाद विश्वविद्यालय की प्रो. रेखा पांडे ने सत्र की अध्यक्षता की।
इस सत्र में पारंपरिक बुनकरों की भूमिका, उनके कौशल और वस्त्र कला की विरासत को आगे बढ़ाने के प्रयासों के महत्व पर चर्चा हुई।
सेंटर की निदेशक प्रो. सलमा अहमद फारूकी के अनुसार, सेमिनार में दक्कन क्षेत्र में वस्त्र उत्पादन के ऐतिहासिक महत्व और वहां के आर्थिक एवं सांस्कृतिक जीवन में कारीगरों तथा बुनकर समुदायों के योगदान पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।
सेमिनार का अंतरविषयक दृष्टिकोण ऐतिहासिक शोध को वस्त्र कला के पुनरुद्धार, पारंपरिक कारीगरी, प्राकृतिक रेशों, टिकाऊ उत्पादन और पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानीय ज्ञान के हस्तांतरण जैसे समकालीन विषयों से जोड़ने पर केंद्रित रहा।
इसमें देशभर से वस्त्र शोधकर्ताओं, उद्योग जगत के विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और वस्त्र कला के पुनरुद्धार के लिए काम करने वाले लोगों ने भाग लिया। प्रतिभागियों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए और विभिन्न विषयों पर सार्थक चर्चा की।
दक्कन की पारंपरिक वस्त्र परंपराओं में आ रही गिरावट के संदर्भ में यह सेमिनार विशेष महत्व रखता है। पारंपरिक बुनाई, प्राकृतिक रेशों के इस्तेमाल और पीढ़ियों से चले आ रहे कारीगरी के ज्ञान को संरक्षित करना आज एक बड़ी चुनौती है।
सेमिनार ने इस दिशा में काम कर रहे विशेषज्ञों और वस्त्र कला के पुनरुद्धार से जुड़े लोगों के प्रयासों को रेखांकित किया। साथ ही यह संदेश दिया कि पारंपरिक वस्त्र कला का संरक्षण केवल सांस्कृतिक विरासत को बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े कारीगरों के कौशल, आजीविका और स्थानीय ज्ञान परंपराओं को भी सुरक्षित रखना आवश्यक है।