जश्न-ए-रेख्ता आयोजन नहीं, उर्दू भाषा का त्योहार है

Story by  राकेश चौरासिया | Published by  [email protected] • 1 Months ago
जश्न-ए-रेख्ता आयोजन नहीं, उर्दू भाषा का त्योहार है

मंसूरुद्दीन फरीदी / नई दिल्ली

जश्ने-रेख़्ता  किसी आयोजन का नाम नहीं है, बल्कि यह संस्कृति और भाषा का पर्व है. यह गंगा-जिमनी सभ्यता का एक आकर्षक उदाहरण है, न केवल भारत में, बल्कि दुनिया के किसी अन्य कोने में ऐसा उदाहरण नहीं मिल सकता है.

किसी भाषा की इससे बड़ी सेवा और कुछ नहीं हो सकती.यह खूबसूरत महफिल है, खूबसूरत जमावड़ा है, खूबसूरत आयोजन और खूबसूरत उत्सव है.

जश्ने-रेख्ता में भाषा की मिठास और उसके प्रति प्रेम ही है, जिसने आज सभी को एक साथ ला दिया है.दिल्ली के लोगों की ये अभिव्यक्ति जश्ने-रेख्ता की खूबसूरती और उर्दू के आकर्षण का बखान करती है.

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जश्ने-रेख्ता की कोरोना काल के तीन सालो अंतराल के बाद वापसी हुई. उर्दू समुदाय के साथ-साथ उर्दू में रुचि रखने वालों और भाषा व संस्कृति के प्रशंसकों के लिए यह एक बड़ी खुशखबरी है.
राजधानी की शान कहे जाने वाले इंडिया गेट के सामने मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम परिसर के सामने जश्ने-रेख्ता उत्सव ने हजारों लोगों को दीवाना किया. ऐसा लग रहा है कि नई पीढ़ी हवा का मुस्कान, हंसी और उर्दू के नाम पर ताली बजाकर रोशन नेशनल स्टेडियम में आनंद ले रही है, जो अगले दो दिनों तक जारी रहेगा.

जब शाने-महफिल जावेद अख्तर हों, तो अंदाजा लगा सकते हैं कि पार्टी की दुनिया क्या होगी, ताली-ताल और ठहाके, हंसी-ठिठोली, ऐसी बातें, ऐसे किस्से और ऐसे अनुभव, जो सिर्फ जावेद अख्तर ही शेयर कर सकते हैं, जो आपको हमेशा याद रहेंगे, जीवन भर भूल नहीं सकते.

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एक रंगीन शाम, एक यादगार शाम, जिसमें जावेद अख्तर ने जश्ने-रेख्ता के उद्घाटन पर उर्दू पर अपनी छापों और अनुभवों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया, तो हरिहरन की प्रस्तुति ने लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया.

किताबों की दुकानों से लेकर एवाने-जायका तक और सेल्फी प्वाइंट्स से लेकर मीटिंग हॉल तक मानो जीत के जश्न के कोने-कोने में रंगों की बहार छाई हो, मुस्कुराहटों का राज हो और खुशियों का साया हो.

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इस मौके पर आवाज-द वॉयस ने विभिन्न लोगों से उर्दू के बारे में बात की और उनके अनुभव सुने.


चंडीगढ़ के एक सिख युवक ने कहा कि जश्ने-रेख््ता उनके लिए एक उत्सव की तरह है, जो तीन साल से याद आ रहा था और अब फिर से शुरू हो गया है. यह एक ऐसी जगह है, जहाँ भाषा से लेकर संस्कृति तक बहुत कुछ सीखा जा सकता है.यह राजधानी में भाषा और संस्कृति का सबसे सुंदर त्योहार है.

एक पंजाबी किशोरी ने कहा कि मैं पंजाब यूनिवर्सिटी से उर्दू की छात्रा हूं. उर्दू सीखी, तो जश्ने-रेख़्ता के बारे में पता चला. मैंने रेख़्ता की वेबसाइट देखी. 2019 में पहली बार ज्वाइन किया. निस्संदेह अनुभव बहुत सुंदर था. मगर फिर आया कोरोना काल. तो यह थम गया. इन भावनाओं का वर्णन करना मुश्किल है.

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राजधानी के साहित्यकारों का कहना है कि रेख़्ता ने वो किया है, जो आज तक कोई नहीं कर पाया. अलग-अलग सभ्यताओं को उर्दू के नाम पर एक छत के नीचे ला दिया. यहाँ हर कोई उर्दू का दीवाना है. रेख़्ता में नाम से लोग एक हैं. उर्दू से आपस में जुड़ाव की तीव्रता है, जो किसी और संस्था में देखने को नहीं मिलती. रेख़्ता सिर्फ एक पहलू पर नहीं, बल्कि अलग-अलग पहलुओं पर काम कर रही है, इसलिए आप यहाँ उत्सव का दृश्य देख रहे हैं.

दिल्ली की एक छात्रा इकार फरजाना ने कहा, ‘‘मैं पहली बार आई हूं, मुझे इस माहौल से प्यार हो गया है. ऐसा माहौल मिलना मुश्किल होगा. वह कहती हैं कि मेरी पसंदीदा शायर जॉन एलिया हैं.

एक अन्य छात्रा यास्मीन कहती हैं कि उर्दू प्रेम का संदेश देने के लिए सबसे आकर्षक भाषा है. हर भाषा खास है. हर भाषा में कुछ ऐसा है, जो आपको आकर्षित करता है.

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बनारस से आए युवा प्रतिभागी त्रिवेदी ने कहा कि यह कोई कार्यक्रम नहीं, बल्कि उर्दू संस्कृति को बढ़ावा देने वाला उत्सव है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते. मुझे राहत इंदौरी और मुनव्वर राणा पसंद आते हैं.

दिल्ली के एक अन्य युवक साहिल फारूकी ने कहा कि मैं अभी भी एक छात्र हूं और मैं यहां उर्दू के आकर्षण के कारण हूं. मुझे शायरी का शौक है. जश्ने-रेख़्ता की सजावट में इस्तेमाल की गई नज्में बहुत अच्छी हैं. मैं पढ़ सकता हूँ और उन्हें समझने की कोशिश कर रहा हूं. मैं उर्दू नहीं जानता, लेकिन मौका मिला, तो इसमें सुधार करने की कोशिश करूंगा.

मास कॉम की छात्रा शिक्षा मिश्रा ने कहा कि जश्ने-रेख़्ता जैसा मंच मिलना मुश्किल है. मुझे भी उर्दू पसंद है. हर भाषा कुछ न कुछ सिखाती है. शायरी की वजह से मैं उर्दू से आकर्षित हूं.