रहमत उल्लाह ने अपनी बेगम नरशिमा संग वैष्णव गुरु आसन जुलूस का किया नेतृत्व

Story by  राकेश चौरासिया | Published by  [email protected] • 7 Months ago
रहमत उल्लाह ने अपनी बेगम नरशिमा संग वैष्णव गुरु आसन जुलूस का नेतृत्व किया

मुन्नी बेगम / गुवाहाटी

गुवाहाटी का एक मुस्लिम जोड़ा और एक नामघर ‘धर्म पर मानवता की जीत’ का जश्न मना रहे हैं. गुवाहाटी के पूर्वी हिस्से में बिरकुची के बिहागी नगर इलाके का दौरा कर रहे मुस्लिम दंपती रहमत उल्लाह उर्फ राणा और नरशिमा बेगम बरई पूरे वैष्णव रीति-रिवाजों और गुरु आसन के साथ जुलूस का नेतृत्व कर रहे हैं.

खास बात यह है कि इस दंपति ने मंदिर में अपने सुख-समृद्धि की कामना नहीं की, बल्कि वे गुरुजन के सामने इसलिए घुटने टेक रहे हैं कि क्षेत्र में एक हिंदू मित्र के पिता शीघ्र स्वस्थ हो जाएं. जब देश में कई विवाद हो रहे हैं, तो बिरकुची में इस मुस्लिम जोड़े की उदारता निश्चित रूप से समाज के लिए एक आदर्श है. इसी तरह बिहारी नगर नामघर समिति की उदारता भी काबिले तारीफ और काबिले तारीफ है.

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आवाज-द वॉयस के साथ एक साक्षात्कार में, नरशिमा बेगम बरई कहती हैं, ‘‘मैं बचपन से ही एनेकुवा जैसे समाज में पली-बढ़ी हूं, जहां कभी किसी तरह का भेदभाव नहीं था.’’

गुवाहाटी की रहने वाली नरशिमा अब गुवाहाटी के बिरकुची इलाके की स्थायी निवासी हैं. अपने पति रहमत उल्लाह के साथ गुरु के आसन के सामने झुककर, उनके कंधे पर एक निर्वाण असमिया मेखला (चादर) और एक फूल गमछा पहने, और वैष्णव भक्तों से आशीर्वाद प्राप्त करने का दृश्य वास्तव में दिल को छू लेने वाला है.

उन्होंने बताया कि यह पहली बार नहीं है जब मैं मंदिर गई. मैं बचपन से ही मंदिर जाती रही हूं. मैंने अपने स्वयं के लिखित निबंध के लिए प्रथम पुरस्कार जीता. उन्होंने मथियाशिगा क्षेत्रीय रास में ‘राधा’ की भूमिका निभाई.’’

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नरशिमा बेगम बरई सभी स्थानीय महिलाओं के साथ मंदिर के अंदर दीहनम करती हैं.


इस संदर्भ में रहमत उल्लाह कहते हैं, ‘‘कोई भी धर्म इंसान को छुआछात नहीं सिखाता है. मानवता की गहराई सभी धर्मों की जड़ों में छिपी है. अगर हम एक दूसरे के लिए मदद करते हैं, तो मानव समाज वास्तव में समृद्ध होगा.’’

इफले, बिहुगी नगर नामघर के संस्थापकों में से एक और एक अनुभवी सामाजिक कार्यकर्ता कमलेश्वर बर्मा, नरशिमा और रहमत उल्लाह को आशीर्वाद देते हुए कहते हैं कि हमारे पास सामाजिक सुधार के लिए बहुत काम है.

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यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि असमिया समाज में इस तरह के धार्मिक उदारवाद के कई उदाहरण हैं. आज भी कई ग्रामीण इलाकों में हिंदू और मुसलमान धार्मिक सीमाओं को लांघकर हरिनाम किताब के रस में डूबे नजर आते हैं.