रमजान का महीना दुआओं की कबूलियत का खास समय माना जाता है। इस मुबारक महीने में दुआ मांगने का तरीका सिर्फ लफ्ज़ों तक सीमित नहीं होता, बल्कि दिल की सच्चाई और नीयत की पाकीज़गी भी ज़रूरी होती है।
सबसे पहले दुआ से पहले अपनी नीयत साफ करें। दिल में यह यक़ीन रखें कि अल्लाह सब सुनने और सब जानने वाला है। बेहतर है कि दुआ से पहले और बाद में दरूद शरीफ़ पढ़ें और अल्लाह की हम्द व सना बयान करें।
दुआ मांगते समय हाथ उठाना, किब्ला की तरफ रुख करना और विनम्रता के साथ बैठना अच्छा माना जाता है। लेकिन सबसे अहम चीज़ यह है कि इंसान पूरे यकीन और तवक्कुल के साथ दुआ करे।
रमजान में खास तौर पर इफ्तार के वक्त, सहरी के समय और आखिरी अशरे में दुआ करना बहुत अफज़ल माना गया है। खासकर शबे कद्र की रात दुआओं की कबूलियत की रात है।
दुआ मांगते समय पहले अपने गुनाहों की माफी मांगें, फिर अपने लिए, अपने वालिदैन, रिश्तेदारों और पूरी उम्मत के लिए भलाई की दुआ करें। दुआ सादगी से, अपने अल्फाज़ में भी की जा सकती है।
सबसे जरूरी बात यह है कि जल्दबाज़ी न करें। अगर दुआ तुरंत पूरी न हो तो मायूस न हों। अल्लाह अपने बंदे के लिए वही फैसला करता है जो उसके लिए बेहतर हो।
रमजान में दुआ का सही तरीका यही है कि इंसान तौबा, सब्र और यकीन के साथ अपने रब से जुड़ा रहे और हर हाल में शुक्र अदा करता रहे।