इसी समय लैलतुल क़द्र आने की उम्मीद की जाती है। इसे शब ए क़द्र भी कहा जाता है। इस्लाम में इसे बहुत पवित्र रात माना जाता है
इस्लामी मान्यता के अनुसार इसी रात कुरआन का नाज़िल होना शुरू हुआ था।
कुरआन की सूरह अल क़द्र में इस रात की अहमियत बताई गई है।
इसमें कहा गया है कि यह रात हजार महीनों से बेहतर है। यानी इस रात की इबादत का सवाब एक लंबी उम्र की इबादत से भी ज्यादा माना जाता है।
लैलतुल क़द्र की सटीक तारीख तय नहीं होती। माना जाता है कि यह रमज़ान के आखिरी दस दिनों की विषम रातों में से किसी एक में होती है।
जैसे इक्कीसवीं, तेईसवीं, पच्चीसवीं, सत्ताईसवीं या उनतीसवीं रात।
आम तौर पर लोग सत्ताईसवीं रात को ज्यादा अहम मानते हैं और उस रात ज्यादा इबादत करते हैं।