“परहित सरिस धरम नहि भाई।
पर पीड़ा सम नहि अधमाई॥”
अर्थ: दूसरों की भलाई से बड़ा कोई धर्म नहीं और दूसरों को दुख देने से बड़ा कोई पाप नहीं।
धीरज धरम मित्र अरु नारी।
आपद काल परखिए चारी॥”
अर्थ: धैर्य, धर्म, मित्र और जीवनसाथी की असली पहचान मुश्किल समय में होती है
मुखिया मुख सो चाहिए, खान-पान को एक।
पालइ-पोसइ सकल अंग, तुलसी सहित विवेक॥”
अर्थ: मुखिया को शरीर के मुख की तरह होना चाहिए, जो सभी अंगों का समान रूप से ध्यान रखे।
“तुलसी मीठे बचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर।
वशीकरण इक मंत्र है, परिहरु बचन कठोर॥”
अर्थ: मीठे शब्दों से हर तरफ सुख और प्रेम पैदा होता है, जबकि कठोर वाणी रिश्ते बिगाड़ सकती है।
“दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान।
तुलसी दया न छोड़िए, जब लग घट में प्रान॥”
अर्थ: दया धर्म की जड़ है और अहंकार पाप का कारण। इसलिए जीवनभर दया का भाव बनाए रखना चाहिए।
“काम क्रोध मद लोभ की, जब लग मन में खान।
तौ लग पंडित मूरखौ, तुलसी एक समान॥”
अर्थ: जब तक मनुष्य काम, क्रोध, अहंकार और लोभ से मुक्त नहीं होता, तब तक उसका ज्ञान अधूरा है।
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