न्यूयॉर्क ऑक्शन हाउस में प्रमोद कुर्लेकर की “गंगा-जमुनी तहज़ीब” पेंटिंग की नीलामी

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 09-06-2026
Pramod Kurlekar’s painting “Ganga-Jamuni Tehzeeb” auctioned at a New York auction house.
Pramod Kurlekar’s painting “Ganga-Jamuni Tehzeeb” auctioned at a New York auction house.

 

भक्ति चालक

यह बात है साल 2023 की। उत्तर प्रदेश में एक संवैधानिक पद पर बैठे नेता ने एक विवादित बयान दिया था। उन्होंने हिंदू त्योहारों में मुसलमानों के दुकानें लगाने को लेकर टिप्पणी की थी। इस घटना ने कई लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया। इसकी गूंज सीधे महाराष्ट्र तक पहुंची, और वह भी एक कैनवास पर। उत्तर प्रदेश की उस घटना ने प्रमोद कुर्लेकर जैसे एक संवेदनशील कलाकार के मन को बहुत बेचैन कर दिया। उन्होंने उस बयान का जवाब अपने आर्ट के ज़रिए देने का फैसला किया, और इसी सोच से 'हिज नर्चरर' (His Nurturer) नाम की कलाकृतीने जन्म लिया।

धार्मिक भाईचारे का बेहद खूबसूरत पैगाम देने वाली प्रमोद की इस पेंटिंग को अब अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला है। उनकी बनाई गई यह पेंटिंग सीधे न्यूयॉर्क के 'सोथबीज' (Sotheby's) जो दुनिया का सबसे मशहूर और बड़ा ऑक्शन हाउस है—कीप्रदर्शनी में नज़र आएगी। 'आवाज़-द-वॉयस' से बात करते हुए प्रमोद कुर्लेकरने अपने संघर्ष और इस अनोखी पेंटिंग की दिलचस्प कहानी साझा की।

प्रमोद कुर्लेकर सातारा के नुने गांव के रहने वाले हैं। सातारा ज़िला हमेशा से ही आपसी भाईचारे का मरकज़ रहा है। प्रमोद बताते हैं, "मेरा पूरा बचपन धार्मिक सौहार्द के माहौल में गुज़रा है। मेरे आस-पास हिंदू और मुस्लिम हमेशा से बड़े ही प्यार-मोहब्बत से रहते आए हैं। मेरे आर्ट टीचर आर.बी. कुलकर्णी और एस.एस. शेख थे। बचपन में मुझे कभी इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि वे दोनों अलग-अलग मज़हब के हैं।"

वह आगे कहते हैं, "हमारी जात, हमारा मज़हब. यह सब पैदा होने के बाद इस समाज ने हम पर थोपा है। जब इंसान पैदा होता है, तो उसके पास एक सादा सा नाम भी नहीं होता। फिर इन बातों के लिए इंसानियत को भूल जाना, महज़ बेवकूफी है। हिंदू धर्म में संतों ने 'वसुधैव कुटुंबकम'की तालीम दी है। तो फिर यह नफरत किस लिए?" उनके इसी जज़्बे से 'हिज नर्चरर' की शुरुआत हुई।

पेंटिंग बनाने का खयाल कैसे आया?

पेंटिंग के पीछे की सोच के बारे में बताते हुए प्रमोद कुर्लेकर कहते हैं, "उत्तर प्रदेश के उस नेता के बयान ने मुझे गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया। उनका वह बयान मुझे बहुत गलत लगा। एक कलाकार होने के नाते, मेरे संवेदनशील मन को वह बात बिल्कुल रास नहीं आई। आज हर कोई एक-दूसरे को शक की निगाह से देख रहा है और इसका सीधा असर देश के सामाजिक और आर्थिक हालात पर पड़ रहा है। हम सबके रोज़गार एक-दूसरे पर टिके हैं। ऐसे में अगर जात-मज़हब देखकर खरीद-फरोख्त की गई, तो इसका समाज की व्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ेगा।"

वह आगे कहते हैं, "हर मज़हब में कुछ बुरे लोग होते हैं। उन पर कानून के तहत सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन अगर हम 'बांटो और राज करो' की नीति पर चले, तो इससे बेगुनाह लोगों पर ज़ुल्म होगा।"

 

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

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पूरी दुनिया में पहुंची 'गंगा-जमुनी तहज़ीब'

'हिज नर्चरर' को साल 2024 में 'पोर्ट्रेट सोसाइटी ऑफ अमेरिका' के इंटरनेशनल कॉम्पिटिशन में सम्मान मिला। इसके बाद 2025 में, 'आर्ट रिन्यूअल सेंटर' के इंटरनेशनल कॉम्पिटिशन में 5,000 पेंटिंग्स के बीच इस पेंटिंग ने तीसरा मुकाम हासिल किया। और अब यही पेंटिंग न्यूयॉर्क के सोथबीजकी प्रदर्शनी में पूरी दुनिया के सामने पेश की जाएगी।

सोथबीज ने इस पेंटिंग की बेस प्राइज़ 25,000 से 35,000 डॉलर्स (करीब 21 से 30 लाख रुपये) तय की है। प्रमोद कहते हैं, "मेरा मकसद कोई इनाम जीतना नहीं था। मैं बस इतना चाहता था कि मैंने जो विचार इस पेंटिंग के ज़रिए रखे हैं, वे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचें। मुझे सबसे ज़्यादा खुशी इस बात की है कि मेरी सोच को एक ग्लोबल मंच मिल गया है।"

वह आगे कहते हैं, "सोथबीज की तरफ से मुझसे इस पेंटिंग के ऑक्शन के बारे में पूछा गया था। सच कहूं तो, मैं आज भी इसे बेचना नहीं चाहता। लेकिन अगर मैं इसे बेचने के लिए राज़ी नहीं होता, तो शायद वे इसे अपनी प्रदर्शनी में भी नहीं रखते। क्योंकि उनका असल मकसद ऑक्शन और प्रदर्शनी ही होता है। इसलिए मैंने अपनी पेंटिंग वहां भेजने के लिए हामी भर दी।"