जन्मदिन विशेष शायर अली सरदार जाफ़रीः कोई ‘सरदार’ कब था इससे पहले तेरी महफ़िल में

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] • 1 Months ago
शायर अली सरदार जाफ़री
जा़हिद ख़ान

‘‘कोई ‘सरदार’ कब था इससे पहले तेरी महफ़िल में

बहुत अहल-ए-सुखन उट्ठे बहुत अहल-ए-कलाम आये.’’

अली सरदार जाफ़री का यह शे’र उनकी अज़्मत और उर्दू अदब में अहमियत बतलाने के लिए काफी है. अली सरदार जाफ़री एक अकेले शख़्स का नाम नहीं, बल्कि एक पूरे अहद और तहरीक का नाम है.

उनका अदबी काम, सियासी-समाजी तहरीक में हिस्सेदारी और तमाम तहरीरें इस बात की तस्दीक करती हैं. वे न सिर्फ एक जोशीले अदीब, इंक़लाबी शायर थे, बल्कि मुल्क की आज़ादी की तहरीक में भी उन्होंने सरगर्म हिस्सेदारी की.
 
अली सरदार जाफ़री तरक़्क़ीपसंद तहरीक के बानियों में से एक थे और आखिरी वक्त तक वे इस तहरीक से जुड़े रहे.
 
मशहूर अफ़सानानिगार कृश्न चंदर उनकी अज़्मत को कम्युनिस्ट पार्टी की निशानी हंसिया हथौड़ा के तौर पर देखते थे. वे उनके बारे में यहां तक कहते थे, ‘‘उसके चेहरे पर हंसते हथौड़े का निशान है.’’ सज्जाद ज़हीर की नज़र में भी सरदार जाफ़री का बड़ा मर्तबा और एहतराम था. उनके बारे में ज़हीर का ख्याल था,‘‘सरदार हमारी तहरीक की शमशीर-ए-बेनियाम हैं.’’
 
अली सरदार जाफ़री ने अपनी पूरी ज़िंदगी अदब और आंदोलनों के नाम कर दी थी. चाहे आजा़दी का आंदोलन हो, कामगार-मज़दूरों के धरने-प्रदर्शन, स्टूडेंट्स मूवमेंट हो या फिर अदीबों का आंदोलन वे इन सभी आंदोलनों में हमेशा पेश-पेश रहते थे.
 
अली सरदार जाफ़री का संघर्ष मुल्क की आज़ादी तक ही महदूद नहीं रहा, आज़ादी के बाद उन्होंने एक अलग लड़ाई लड़ी. यह लड़ाई थी देश में लोकतांत्रिक मूल्यों, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, राष्ट्रीय एकता और अखंडता काइमी की.
 
देश की समृद्ध विरासत और गंगा-जमुनी तहज़ीब को बचाने की. निदा फाज़ली ने अपने एक लेख में अली सरदार जाफ़री के बारे में क्या खूब कहा है, ‘‘सरदार जाफ़री, नाम से मुसलमान थे, लेकिन अपने काम से लम्बी तारीख के सेक्युलर हिंदुस्तान थे.’’
 
साल 1913 का नवम्बर, अली सरदार जाफ़री की पैदाइश का महीना है. अपनी एक नज़्म में वे इस बात का ज़िक्र कुछ इस अंदाज में करते हैं,
 
‘‘नवम्बर, मेरा गहवारा है, ये मेरा महीना है

इसी माहे-मन्नवर में

मिरी आँखों ने पहली बार सूरज की सुनहरी रौशनी देखी

मिरे कानों में पहली बार इन्सानी सदा आयी.’’

लिखने-पढ़ने का चस्का सरदार जाफ़री को बचपन से ही पड़ गया था. खास तौर से उन्हें अनीस के मर्सिये बहुत पंसद थे. पन्द्रह-सोलह बरस की उम्र आने तक उन्होंने मर्सिये लिखने शुरू कर दिए थे.
 
अली सरदार जाफ़री की ज़िंदगी में बड़ा बदलाव तब आया, जब उन्होंने लेनिन की जीवनी पढ़ी. इस क़िताब ने उनकी पूरी ज़िंदगी बदल दी और उन्हें जीने का एक नया मक़सद दे दिया.
 
बहरहाल सरदार जाफ़री ने जब अपनी पहली नज़्म ‘समाज’ लिखी, तो उसने जैसे उनके अदब की पूरी दिशा तय कर दी.
 
‘‘तमन्नाओं में कब तक ज़िंदगी उलझाई जाएगी

खिलौने दे के कब तक मुफ़लिसी बहलाई जाएगी

नया चश्मा है पत्थर के शिगाफ़ों से उबलने को

ज़माना किस क़दर बेताब है करवट बदलने को.’’

अली सरदार जाफ़री के दिल में मेहनतकशों की जानिब सहानुभूति बचपन से ही थी. अवध के सामंती निज़ाम में उन्होंने किसानों का शोषण देखा था. उनका कहना था,‘‘मेहनतकश चाहे खेत के खुले वातावरण में काम करने वाला किसान हो या मिल की कफ़स में कार्यरत मजदूर, शोषण तो उसका हर जगह होता है. सब से अधिक दुख तो इस बात का है कि बाल श्रमिक भी इस शोषण से नहीं बच पाया है.’’
 
 
अंग्रेज हुकूमत के ख़िलाफ आंदोलन और साम्राज्य विरोधी नज़्मों की वजह से उन्हें कई मर्तबा जेल भी जाना पड़ा. सरदार जाफ़री की शायरी में कई मर्तबा विचार इतना हावी हो जाता था कि कुछ रूमानी-इश्किया शायरी करने वाले शायरों को उनके शायर होने पर भी एतराज़ था.
 
लेकिन अपनी इन आलोचनाओं के बाद भी उन्होंने अपनी शायरी का मौजू़ और स्टाइल नहीं बदला. जो उनके दिल को सही लगा, वही लिखा. उन मसलों और मुद्दों पर भी लिखा, जिसे शायर ग़ज़ल या नज़्म का मौजू़ नहीं मानते. मिसाल के तौर पर उनके इन अशआर पर नज़र डालिये,
 
‘‘गाय के थन से निकलती है चमकती चांदी

धुंए से काले तवे भी चिंगारियों के होठों से हंस रहे हैं.’’

अली सरदार जाफ़री, मिजा़ज से इंक़लाबी शायर हैं. उन्होंने ग़ज़लों के बजाय ज़्यादातर नज़्में लिखीं और उनकी इन नज़्मों में वर्ग चेतना साफ तौर पर दिखलाई देती है.
 
‘‘मां है रेशम के कार-ख़ाने में

बाप मसरूफ़ सूती मिल में है

कोख से मां की जब से निकला है

बच्चा खोली के काले दिल में है

जब यहां से निकल के जाएगा

कार-ख़ानों के काम आएगा

अपने मजबूर पेट की ख़ातिर

भूक सरमाए की बढ़ाएगा.’’

सरदार जाफ़री सियासी और समाजी मसलों को यथार्थवादी नज़रिए से देखते हैं. दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी नज़र रहती थी. लिहाज़ा कहीं पर भी कुछ ग़लत होता, किसी के साथ नाइंसाफ़ी और जुल्म होता उनकी क़लम आग उगलने लगती.
 
‘नई दुनिया को सलाम’ नज़्म में वे मेहनत और मेहनतकशों की अहमियत का जिक्र इन अल्फ़ाज़ के साथ करते हैं,
 
‘‘चांद की तरह गोल और सूरज की मानिंद गर्म

आह ये रोटियां आसमानों में पकती नहीं हैं

ये हैं इंसान के हाथों की तख़लीक़

उसकी सदियों की मेहनत का फल.’’

वहीं ‘जमहूर’ नामक अपनी सियासी मसनवी में वे किसानों और कामगारों को आवाज़ देते हुए लिखते हैं,
 
‘‘मसीहा के होंठों का एजाज हम

मुहब्बत के सीने की आवाज़ हम

हमारी ज़बीं पर है मेहनत का ताज

हमीं ने लिया है ज़मीं से खिराज.’’

साल 1944 में आए अली सरदार जाफ़री के पहले काव्य संग्रह ‘परवाज़’ में ऐसी कई रचनाएं मिल जाएंगी, जिनमें किसानों और मज़दूरों की दुर्दशा का ही अकेला चित्रण नहीं है, बल्कि इन रचनाओं के आखि़र में वे उन्हें क्रांति के लिए आवाज़ भी देते हैं.
 
सरदार जाफ़री यह बात अच्छी तरह से जानते थे कि मुल्क में यदि जम्हूरियत की क़ाइमगी होगी, तो वह इन्हीं के दम पर मुमकिन होगी.
 
अली सरदार जाफ़री ने अपनी शायरी में धार्मिक आडंबर, रूढ़ियों और कर्मकांडो का भी खुलकर विरोध किया.
 
‘‘लहू चूसा मजे ले ले के मज़हब ने खुदाई का

बिछाया जाल पीराने कुहन ने पारसाई का.’’

अली सरदार जाफ़री ने न सिर्फ साम्राज्यविरोधी, फासीवाद विरोधी शायरी की बल्कि अपनी शायरी में सामंतवाद और सरमायेदारी की भी पुरज़ोर मुख़ालिफत की. ‘जमहूर’ शीर्षक मसनवी में वे सरमायेदारों को यह कहकर खि़ताब करते हैं,
 
‘‘ये हैं फख्र हैवानित के लिए

ये हैं कोढ़ इंसानियत के लिए.’’

अली सरदार जाफ़री की नज़्मों की कोई भी क़िताब उठाकर देख लीजिए, उनमें इंक़लाबी नज़्में जरूर मिलेंगी. यही नहीं सियासी बेदारी की वजह से देश-दुनिया में जब भी कोई बड़ा वाकिआ होता, अली सरदार जाफ़री उसे अपनी नज़्म में जरूर ढालते.
 
‘बग़ावत’, ‘अहदे हाजिर’, ‘सामराजी लड़ाई’, ‘इंक़लाबे रूस’, ‘मल्लाहों की बग़ावत’, ‘फरेब’, ‘सैलाबे चीन’, ‘जश्ने बग़ावत’ आदि नज़्मों में उन्होंने अपने समय के बड़े सवालों की अक्कासी की है. सच बात तो यह है कि उन्होंने अपने आसपास की समस्याओं से कभी मुंह नहीं चुराया, बल्कि उसकी आंखों में आंखें डालकर बात की.
 
अली सरदार जाफ़री का नाम, मुल्क की उन बावक़ार हस्तियों में भी शुमार होता है, जो हिंद-पाक दोस्ती के बड़े हामी थे और इस दोस्ती के लिए उन्होंने काम भी किया.
 
पाकिस्तान में कई मर्तबा सद्भावना यात्राएं करने के अलावा उन्होंने दोनों मुल्कों के सियासतदां और अवाम को आपस में मिलाने के लिए कोशिशें कीं. उनकी नज्म ‘गुफ़्तगू’ इसी पसमंज़र में लिखी गई है,
 
‘‘गुफ़्तगू बंद न हो

बात से बात चले

सुबह तक शामे मुलाकात चले

हम पे हंसती हुई ये तारों भरी रात चले

........
 
हाथ में हाथ लिये सारा जहां साथ लिये

तोहफः-ए-दर्द लिये प्यार की सौगात लिये

रहगुज़ारों से अदावत के गुज़र जाएंगे

खूं के दरयाओं से हम पार उतर जाएंगे.’’

वहीं अपनी एक और नज़्म ‘अहमद फराज़ के नाम’ में वे कहते हैं,

‘‘तुम्हारा हाथ बढ़ा है जो दोस्ती के लिए

मिरे लिए है वो इक यारे-ग़मगुसार का हाथ

वो हाथ शाखे-गुले-गुलशने-तमन्ना है

महक रहा है मिरे हाथ में बहार का हाथ

........
 
करें ये अहद कि औजारे-जंग जितने हैं

उन्हें मिटाना है और ख़ाक में मिलाना है

करें ये अहद कि अर्बाबे-जंग हैं जितने

उन्हें शराफ़तो-इंसानियत सिखाना है.’’

‘परवाज़’, ‘जम्हूर’, ‘नई दुनिया को सलाम’, ‘खू़न की लकीर’, ‘अम्न का सितारा’, ‘एशिया जाग उठा’, ‘पत्थर की दीवार’, ‘एक ख़्वाब और’, ‘पैराहने शरर’, ‘लहु पुकारता है’, ‘मेरा सफ़र’ अली सरदार जाफ़री के नज़्मों-ग़ज़लों के अहम मजमुए हैं.
 
साल 1947 में आई उनकी क़िताब ‘नई दुनिया को सलाम’ एक प्रबंध काव्य है, जो साम्राज्य-मुखालिफ जज़्बात से लबरेज है. सच बात तो यह है कि ‘नई दुनिया को सलाम’ एक लंबी नज़्म है और उनकी यह नज़्म, आजा़दी के आंदोलन के दौरान लिखी गईं बेहतरीन नज़्मों में शुमार होती है.
 
यह नज़्म उस दौर के शे’री सरमाये में एक आला मुकाम रखती है. अली सरदार जाफ़री ने तरक़्क़ीपसंद तहरीक पर एक आलोचनात्मक क़िताब ‘तरक़्क़ीपसंद अदब’ लिखी तो ‘दीवाने-ग़ालिब’, ‘दीवाने-मीर’ और ‘कबीर बानी’ वे क़िताबें हैं जिनमें ग़ालिब, मीर की शायरी पर गंभीर बात है, तो ‘कबीर बानी’ में वे कबीर के 128 प्रमुख पदों का विचारोत्तेजक विश्लेषण करते हैं.
 
‘यह खू़न किसका है’ और ‘पैकार’ सरदार जाफ़री द्वारा लिखे गए नाटक हैं, वहीं क़िताब ‘मंज़िल’ में उनकी कहानियां संकलित हैं. ‘पैगम्बराने-सुखन’, ‘तरक़्क़ीपसंद अदब’ ‘इक़बाल शनासी’, ‘ग़ालिब का सूफियाना खयाल’ अली सरदार जाफ़री की आलोचनात्मक क़िताबें हैं.
 
अली सरदार जाफ़री न सिर्फ एक बुलंद पाया शायर थे, बल्कि बहुत अच्छे गद्यकार थे. ‘लखनऊ की पांच रातें’ उनकी शाहकार किताब है. अली सरदार जाफ़री एक अदीब के साथ-साथ जर्नलिस्ट भी थे और उन्होंने जर्नलिज्म के फर्ज़ को भी अंज़ाम दिया.
 
लखनऊ में उन्होंने मजाज़ और सिब्ते हसन के साथ मिलकर एक मैगजीन ‘नया अदब’, तो मुंबई में कम्युनिस्ट पार्टी का हफ्तेवार अख़बार ‘कौमी जंग’ और ‘नया ज़माना’ का सज्जाद ज़हीर के साथ मिलकर सम्पादन किया.
 
अली सरदार जाफ़री की कई प्रमुख रचनाओं का दीगर हिंदुस्तानी ज़बानों समेत दुनिया की कई ज़बानों में तर्जुमा हुआ है. अली सरदार जाफ़री एक हरफ़नमौला शख़्सियत थे.
 
ग़ज़लों, नज़्मों और आलोचनात्मक लेखन के अलावा उन्होंने वृतचित्र और धारावाहिकों का लेखन, निर्देशन भी किया. जिसमें ‘कबीर, इक़बाल और आज़ादी’, ‘कहकशां’ और ‘महफिल-ए-यारां’ अहम हैं.
 
कुछ फिल्मों के संवाद, पटकथा और गीत लिखे. देश के सांस्कृतिक राजदूत के तौर पर कई मुल्कों की यात्रा की. कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय हस्तियों रबीन्द्रनाथ ठाकुर, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आज़ाद, सत्यजीत राय, पाब्लो नेरुदा, नाज़िम हिकमत, शोलोखोव, पास्तरनाक, लुई आरगां, एल्या एहरान, खु्रश्चेव और पॉल राब्सन से उनकी मुलाकात-सोहबत रही.
 
अदब और इंसानियत की खि़दमत के लिए अली सरदार जाफ़री को अनेक बड़े सम्मान और पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. जिसमें कुछ खास सम्मान-पुरस्कार हैं ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ (साल 1997), ‘उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार’, साल 1983 में किताब ‘एशिया जाग उठा’ के लिए ‘कुमारन आसन अवार्ड’, ‘राष्ट्रीय इक़बाल सम्मान’, ‘सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार’ (साल 1965), साल 1978 में पाकिस्तान सरकार द्वारा इक़बाल गोल्ड मैडल सम्मान, अंतरराष्ट्रीय उर्दू अवार्ड, महाराष्ट्र सरकार द्वारा संत ध्यानेश्वर अवार्ड और साल 1999 में हावर्ड यूनीवर्सिटी अमेरिका द्वारा ‘अंतरराष्ट्रीय शांति पुरस्कार’ आदि. भारत सरकार ने साल 1967 में उन्हें अपने चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म श्री’ एजाज से भी नवाजा़ था.

अली सरदार जाफरी एक सच्चे इंसाफ़ पंसद और इंसान दोस्त शायर थे. उन्होंने हमेशा अपनी शायरी में इंसानियत और भाईचारे की पैरोकारी की. उनकी शायरी इंसानदोस्ती और इंसानियत की एक बेहतरीन मिसाल है.
 
उनकी नज़्में, ग़ज़ल, तमाम मज़ामीन और तक़रीरें हमारे दिल में एक नई उम्मीद जगाती हैं. मुस्तक़बिल के लिए उनमें एक पैग़ाम है. इस अज़ीम शायर ने अपनी पूरी ज़िंदगानी मज़लूम और मेहनतकश इंसानों के हक़ और इंसाफ़ की लड़ाई लड़ने में गुज़ार दी.
 
उनके रंज-ओ-ग़म, समस्याओं को अपनी नज़्मों-ग़ज़लों में आवाज़ दी. 1 अगस्त, साल 2000 को अली सरदार जाफ़री ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया. आज भले ही सरदार जाफ़री हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अपनी नज़्मों-ग़ज़लों में वे हमेशा ज़िंदा रहेंगे.
 
‘‘मैं सोता हूं और जागता हूं

और जाग कर फिर सो जाता हूं

सदियों का पुराना खेल हूं मैं

मैं मर के अमर हो जाता हूं.’