सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने पर सिमी के चार संदिग्ध भोपाल जेल से रिहा

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] • 1 Years ago
सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने पर सिमी के चार संदिग्ध भोपाल जेल से रिहा

आवाज द वाॅयस / भोपाल

सन 2013 से भोपाल जेल में बंद सिमी के चार कथित कार्यकर्ताओं को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर भोपाल की सेंट्रल जेल से रिहा कर दिया गया. उन्हें कुछ दिन पहले जमानत दे दी गई थी.

जेल अधिकारियों ने सभी कागजी कार्रवाई पूरी करने के बाद विचाराधीन कैदियों को रिहा कर दिया. उनके परिवार वाले सुबह से जेल के बाहर इंतजार कर रहे थे. सीजेएम कोर्ट में जहां उनकी रिहाई के लिए कागजात तैयार किए गए, वहां और जेल के आसपास सुरक्षाकर्मियों की भारी भीड़ थी.

सूत्रों के मुताबिक, मध्य प्रदेश एटीएस ने जमानत के खिलाफ अपील दायर करने का फैसला किया है. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने सिमी के चार कथित कार्यकर्ताओं सिद्दीकी, इस्माइल माशालकर, उमर दंडोती और इरफान को जमानत दे दी.

वे लगभग आठ साल से जेल में थे. सभी महाराष्ट्र के शोलापुर जिले के रहने वाले हैं. जज ने उन्हें इस आधार पर जमानत दी है कि भोपाल जिला अदालत ने उनके मामले में फैसला सुनाया था.

चार कथित सिमी कार्यकर्ताओं को दिसंबर 2013में खंडवा जेलब्रेक के भगोड़ों को पनाह देने और सहायता करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. बताते हैं, सात कथित सिमी कार्यकर्ता दो गार्ड को चाकू मार कर जेल से निकल भागे थे.

सिमी कार्यकर्ताओं के मामलों की पैरवी करने वाले वकील के अनुसार, चारों कार्यकर्ताओं के खिलाफ आईपीसी की धारा 157के तहत मामला दर्ज किया गया था. उन पर यूएपीए, आर्म्स एक्ट और आईपीसी की धाराओं के तहत हत्या के प्रयास, जालसाजी और आपराधिक साजिश का आरोप लगाया गया था. सिमी के 28अन्य संदिग्धों के साथ चारों को भोपाल जेल में बंद कर दिया गया था.

20 मार्च 2014 को मध्य प्रदेश के आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) की ओर से दायर एक आवेदन पर भोपाल के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ने सिद्दीकी, इस्माइल, उमर और इरफान की जेल रिमांड अवधि बढ़ा दी थी.

90 दिनों की हिरासत पूरी होने पर, संदिग्धों ने इस आधार पर जमानत के लिए आवेदन किया कि जांच एजेंसी ने आरोप पत्र दायर नहीं किया गया है. मगर उनकी याचिका और उसके बाद की अपीलों को 2015में खारिज कर दिया गया .

इसके बाद चारों ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का रुख किया. इसपर राहत से इनकार करते हुए अदालत ने कहा कि चूंकि सीजेएम भोपाल ने जांच के लिए दिए गए समय को 180दिनों तक बढ़ाने के आदेश दिए हैं, इसलिए धारा 167 (2) सीआरपीसी के तहत संदिग्धों की जमानत याचिकाएं सुनवाई योग्य नहीं हैं. इसके बाद वकीलों ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा, “संबंधित दलीलों पर विचार करने के बाद, यह निष्कर्ष निकाला गया कि जहां तक यूएपीए के तहत सभी अपराधों का संबंध है, धारा 43-डी में पहले प्रावधान के तहत समय बढ़ाने के लिए मजिस्ट्रेट का अधिकार क्षेत्र ( 2) (बी) अस्तित्वहीन है. ”

ऐसे में जहां तक ‘जांच पूरी करने के लिए समय बढ़ाने‘ की बात है, मजिस्ट्रेट अनुरोध पर विचार करने के लिए सक्षम नहीं. इस तरह के अनुरोध पर विचार करने के लिए एकमात्र सक्षम प्राधिकारी ‘अदालत‘ है.

चारों को तीन दिनों के भीतर ट्रायल कोर्ट में पेश किया गया,  जहां से उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया.